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20 March, 2014

"उपवन लगे रिझाने" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्यसंग्रह "धरा के रंग" से
एक गीत
♥ उपवन लगे रिझाने ♥
मौन निमन्त्रण देतीं कलियाँ, 
सुमन लगे मुस्काने।
वासन्ती परिधान पहन कर, 
उपवन लगे रिझाने।।
पाकर मादक गन्ध 
शहद लेने मधुमक्खी आई,
सुन्दर पंखोंवाली तितली
 को सुगन्ध है भाई,
चंचल-चंचल चंचरीक, 
आये गुंजार सुनाने।
वासन्ती परिधान पहन कर, 
उपवन लगे रिझाने।।
 
चहक रहे वन-बाग-बगीचे, 
सबका तन गदराया,
महक रहे हैं खेत बसन्ती, 
आम-नीम बौराया,
कोयल, कागा और कबूतर 
लगे रागनी गाने।
वासन्ती परिधान पहन कर, 
उपवन लगे रिझाने।।
 
सरसों के बिरुओं ने हैं,
पीताम्बर तन पर धारे,
मस्त पवन बह रहा
गगन में टिम-टिम करते तारे,
अंगारे से दहके रहे हैं,

वन में ढाक सुहाने।
वासन्ती परिधान पहन कर, 
उपवन लगे रिझाने।।

16 March, 2014

♥ दिवस सुहाने आने पर ♥ (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्यसंग्रह "धरा के रंग" से
एक गीत
♥ दिवस सुहाने आने पर ♥
अनजाने अपने हो जाते,
दिवस सुहाने आने पर।
सच्चे सब सपने हो जाते,
दिवस सुहाने आने पर।।

सूरज की क्या बात कहें,
चन्दा जब आग उगलता हो,
साथ छोड़ जाती परछाई,
गर्दिश के दिन आने पर।

पानी से पानी की समता,
कीचड़ दाग लगाती है,
साज और संगीत अखरता,
सुर के गलत लगाने पर।

दूर-दूर से अच्छे लगते,
वन-पर्वत, बहतीं नदियाँ,
कष्टों का अन्दाज़ा होता,
बाशिन्दे बन जाने पर।

हर पत्थर हीरा नहीं होता,
पाषाणों की ढेरी में,
सोच-समझकर अंग लगाना,
रत्नों को पा जाने पर।

जो सुख-दुख में सहभागी हों,
वो किस्मत से मिलते हैं,
स्वर्ग नर्क सा लगने लगता,
मन का मीत न पाने पर।

अनजाने अपने हो जाते,
दिवस सुहाने आने पर।
सच्चे सब सपने हो जाते,
दिवस सुहाने आने पर।।

12 March, 2014

"आओ साथी प्यार करें..!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्यसंग्रह "धरा के रंग" से
एक गीत
"आओ साथी प्यार करें..!"
ठण्डी-ठण्डी हवा चल रही,
सिहरन बढ़ती जाए!
आओ साथी प्यार करें हम,
मौसम हमें बुलाए!!

त्यौहारों की धूम मची है,
पंछी कलरव गान सुनाते।
बया-युगल तिनके ला करके,
अपना विमल-वितान बनाते।
झूम-झूमकर रसिक भ्रमर भी,
गुन-गुन गीत सुनाए!
आओ साथी प्यार करें हम,
मौसम हमें बुलाए!!

बीत गई बरसात हुआ,
गंगा का निर्मल पानी।
नीले नभ पर सूरज-चन्दा,
चाल चलें मस्तानी।
उपवन में भोली कलियों का,
कोमल मन मुस्काए!
आओ साथी प्यार करें हम,
मौसम हमें बुलाए!!

हलचल करते रहना ही तो,
जीवन के लक्षण हैं।
चार दिनों के लिए चाँदनी,
बाकी काले क्षण हैं।
बार-बार यूँ ही जीवन में,
सुखद चन्द्रिका छाए!
आओ साथी प्यार करें हम,
मौसम हमें बुलाए!!

रोली-अक्षत-चन्दन लेकर,
करें आज अभिनन्दन।
सुख देने वाली सत्ता का,
आओ करें हम वन्दन।
उसकी इच्छा के बिन कोई,
पत्ता हिल ना पाए!
आओ साथी प्यार करें हम,
मौसम हमें बुलाए!!

08 March, 2014

"पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्यसंग्रह "धरा के रंग" से
एक गीत
"पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा"

कंकड़ को भगवान मान लूँ, 
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा! 
काँटों को वरदान मान लूँ, 
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा! 

दुर्गम पथ, बन जाये सरल सा, 
अमृत घट बन जाए, गरल का, 
पीड़ा को मैं प्राण मान लूँ. 
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा! 

बेगानों से प्रीत लगा लूँ, 
अनजानों को मीत बना लूँ, 
आशा को परिमाण मान लूँ, 
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा! 

रीते जग में  मन भरमाया, 
जीते जी माया ही माया, 
साधन को संधान मान लूँ, 
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा!

04 March, 2014

"कंचन का बिछौना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्यसंग्रह "धरा के रंग" से

कंचन का बिछौना
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रूप धरती ने धरा कितना सलोना।
बिछ गया खेतों में कंचन का बिछौना।।

भार से बल खा रहीं हैं डालियाँ,
शान से इठला रहीं हैं बालियाँ,
छा गया चारों तरफ सोना ही सोना।
बिछ गया खेतों में कंचन का बिछौना।।

रश्मियों ने रूप कुन्दन का सँवारा,
नयन को सबके लुभाता यह नज़ारा,
धान्य से सज्जित हुआ हरेक कोना।
बिछ गया खेतों में कंचन का बिछौना।।

मस्त होकर गा रहा लोरी पवन है,
नाचता होकर मुदित जन-गण मगन है,
मिल गया उपहार में स्वर्णिम खिलौना।
बिछ गया खेतों में कंचन का बिछौना।।

28 February, 2014

"मनुजता की चूनरी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्यसंग्रह "धरा के रंग" से

मनुजता की चूनरी 
ज़िन्दगी हमारे लिए
आज भार हो गई! 
मनुजता की चूनरी तो
तार-तार हो गई!! 
हादसे सबल हुए हैं 
गाँव-गली-राह में 
खून से सनी हुई 
छुरी छिपी हैं बाँह में 
मौत ज़िन्दगी की 
रेल में सवार हो गई! 
मनुजता की चूनरी तो
तार-तार हो गई!! 

भागने की होड़ में
उखाड़ है-पछाड़ है
आज जोड़-तोड़ में
अजीब छेड़-छाड़ है
जीतने की चाह में
करारी हार हो गई!
मनुजता की चूनरी तो
तार-तार हो गई!! 

चीत्कार काँव-काँव 
छल रही हैं धूप-छाँव 
आदमी के ठाँव-ठाँव 
चल रहे हैं पेंच-दाँव 
सभ्यता के हाथ 
सभ्यता शिकार हो गई! 
मनुजता की चूनरी तो
तार-तार हो गई!! 

24 February, 2014

"नवगीत-पंक में खिला कमल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्यसंग्रह "धरा के रंग" से

पंक में खिला कमल 
स्वर अर्चना चावजी 


पंक में खिला कमल, 
किन्तु है अमल-धवल! 
बादलों की ओट में से, 
चाँद झाँकता नवल!! 

डण्ठलों के साथ-साथ, 
तैरते हैं पात-पात, 
रश्मियाँ सँवारतीं , 
प्रसून का सुवर्ण-गात, 
देखकर अनूप-रूप को, 
गया हृदय मचल!  
बादलों की ओट में से, 
चाँद झाँकता नवल!!  

पंक के सुमन में ही,  
सरस्वती विराजती, 
श्वेत कमल पुष्प को, 
ही शारदे निहारती, 
पूजता रहूँगा मैं, 
सदा-सदा चरण-कमल! 
बादलों की ओट में से, 
चाँद झाँकता नवल!! 

20 February, 2014

"धरती का भगवान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्यसंग्रह "धरा के रंग" से
"धरती का भगवान"
सूरज चमका नील-गगन में।
फैला उजियारा आँगन में।।

काँधे पर हल धरे किसान।
करता खेतों को प्रस्थान।।

मेहनत से अनाज उपजाता।
यह जग का है जीवन दाता।।

खून-पसीना बहा रहा है।
स्वेद-कणों से नहा रहा है।।

जीवन भर करता है काम।
लेता नही कभी विश्राम।।

चाहे सूर्य अगन बरसाये।
चाहे घटा गगन में छाये।।

यह श्रम में संलग्न हो रहा।
अपनी धुन में मग्न हो रहा।।

मत कहना इसको इन्सान।
यह धरती का है भगवान।।

16 February, 2014

"बेटी की पुकार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्यसंग्रह "धरा के रंग" से
"बेटी की पुकार"
माता मुझको भी तो,
अपनी दुनिया में आने दो!
सीता-सावित्री बन करके,
जग में नाम कमाने दो!

अच्छी सी बेटी बनकर मैं,
अच्छे-अच्छे काम करूँगी,
अपने भारत का दुनिया में
सबसे ऊँचा नाम करूँगी,
माता मुझको भी तो अपना,
घर-संसार सजाने दो!
माता मुझको भी तो
अपनी दुनिया में आने दो!

बेटे दारुण दुख देते हैं
फिर भी इतने प्यारे क्यों?
सुख देने वाली बेटी के
गर्दिश में हैं तारे क्यों?
माता मुझको भी तो अपना
सा अस्तित्व दिखाने दो!
माता मुझको भी तो
अपनी दुनिया में आने दो!

बेटों की चाहत में मैया!
क्यों बेटी को मार रही हो?
नारी होकर भी हे मैया!
नारी को दुत्कार रही हो,
माता मुझको भी तो अपना
जन-जीवन पनपाने दो!
माता मुझको भी तो 
अपनी दुनिया में आने दो!

12 February, 2014

"आशंका" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
कविता
कौंध गई बे-मौसम, 
चपला नीलगगन में! 
अनहोनी की आशंका, 
गहराई मन में!!  

तेजविहीन हुए तारे, 
चन्दा शर्माया। 
गन्धहीन हो गया सुमन, 
उपवन अकुलाया!! 

रंग हुए बदरंग, 
अल्पना डरी हुई है! 
भाव हुए हैं भंग 
कल्पना मरी हुई है!! 

खलिहानों में पड़े हुए 
गेहूँ सकुचाए! 
दीन-किसानों के 
चमके चेहरे मुर्झाए!!  

वही समझ सकता है, 
जिसकी है यह माया! 
कहीं गुनगुनी धूप, 
कहीं है शीतल छाया!!

08 February, 2014

"जरा सी बात" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
ग़ज़लिका 
जरा सी बात में ही, 
युद्ध होते हैं बहुत भारी। 

जरा सी बात में ही, 
क्रुद्ध होते हैं धनुर्धारी।। 

जरा सी बात ही, 
माहौल में विष घोल देती है। 

जरा सी जीभ ही, 
कड़ुए वचन को बोल देती है।। 

मगर हमको नही इसका, 
कभी आभास होता है। 

अभी जो घट रहा कल को, 
वही इतिहास होता है।। 

02 February, 2014

"बादल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
एक गीत
कहीं-कहीं छितराये बादल,
कहीं-कहीं गहराये बादल।

काले बादल, गोरे बादल,
अम्बर में मँडराये बादल। 

उमड़-घुमड़कर, शोर मचाकर,
कहीं-कहीं बौराये बादल।
भरी दोपहरी में दिनकर को,
चादर से ढक आये बादल।

खूब खेलते आँख-मिचौली,
ठुमक-ठुमककर आये बादल।
दादुर, मोर, पपीहा को तो,
मेघ-मल्हार सुनाये बादल।

जिनके साजन हैं विदेश में,
उनको बहुत सताये बादल।

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