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27 June, 2014

(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’) "पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा"

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
 
एक गीत
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा
कंकड़ को भगवान मान लूँ, 
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा! 
काँटों को वरदान मान लूँ, 
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा! 

दुर्गम पथ, बन जाये सरल सा, 
अमृत घट बन जाए, गरल का, 
पीड़ा को मैं प्राण मान लूँ. 
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा!

बेगानों से प्रीत लगा लूँ, 
अनजानों को मीत बना लूँ, 
आशा को परिमाण मान लूँ, 
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा!

रीते जग में  मन भरमाया, 
जीते जी माया ही माया, 
साधन को संधान मान लूँ, 
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा!

15 June, 2014

"अमलतास के पीले झूमर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
 
एक गीत
"अमलतास के पीले झूमर"
तपती हुई दुपहरी में, झूमर जैसे लहराते हैं।
कंचन जैसा रूप दिखाते, अमलतास भा जाते हैं।।
जब सूरज झुलसाता तन को, आग बरसती है भू पर।
ये छाया को सरसाते हैं, आकुल राही के ऊपर।।

स्टेशन और सड़क किनारे, कड़ी धूप को सहते हैं।
लू के गर्म थपेड़े खा कर, खुलकर हँसते रहते हैं।।


शाखाओं पर बैठ परिन्दे, मन ही मन हर्षाते हैं।
इनके पीले-पीले गहने, उनको बहुत लुभाते हैं।।

दुख में कैसे मुस्काते हैं, ये जग को बतलाते हैं।
सहना सच्चा गहना होता है, सीख यही सिखलाते हैं।। 

05 June, 2014

"मखमली लिबास" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
 
एक गीत
"मखमली लिबास" 
मखमली लिबास आज तार-तार हो गया! 
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!  

सभ्यताएँ मर गईं हैं, आदमी के देश में, 
क्रूरताएँ बढ़ गईं हैं, आदमी के वेश में, 
मौत की फसल उगी हैं, जीना भार हो गया! 
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!  

भोले पंछियों के पंख, नोच रहा बाज है, 
गुम हुए अतीत को ही, खोज रहा आज है,  
शान्ति का कपोत बाज का शिकार हो गया! 
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!  

पर्वतों से बहने वाली धार, मैली हो गईं, 
महक देने वाली गन्ध भी, विषैली हो गई, 
जिस सुमन पे आस टिकी, वो ही खार हो गया! 
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!

23 May, 2014

"कठिन बुढ़ापा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
 
एक कविता
"कठिन बुढ़ापा"
बचपन बीता गयी जवानी, कठिन बुढ़ापा आया।
कितना है नादान मनुज, यह चक्र समझ नही पाया।

अंग शिथिल हैं, दुर्बल तन है, रसना बनी सबल है।
आशाएँ और अभिलाषाएँ, बढ़ती जाती प्रति-पल हैं।।

धीरज और विश्वास संजो कर, रखना अपने मन में।
रंग-बिरंगे सुमन खिलेंगे, घर, आंगन, उपवन में।।

यही बुढ़ापा अनुभव के, मोती लेकर आया है।
नाती-पोतों की किलकारी, जीवन में लाया है।।

मतलब की दुनिया मे, अपने कदम संभल कर धरना।
वाणी पर अंकुश रखना, टोका-टाकी मत करना।।

देख-भालकर, सोच-समझकर, ही सारे निर्णय लेना।
भावी पीढ़ी को उनका, सुखमय जीवन जीने देना।।

19 May, 2014

"फिर से आया मेरा बचपन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
एक गीत
"फिर से आया मेरा बचपन"
जब से उम्र हुई है पचपन। 
फिर से आया मेरा बचपन।। 

पोती-पोतों की फुलवारी, 

महक रही है क्यारी-क्यारी, 
भरा हुआ कितना अपनापन। 
फिर से आया मेरा बचपन।। 
इन्हें मनाना अच्छा लगता, 
कथा सुनाना अच्छा लगता, 
भोला-भाला है इनका मन। 
फिर से आया मेरा बचपन।।  

मुन्नी तुतले बोल सुनाती, 

मिश्री कानों में घुल जाती, 
चहक रहा जीवन का उपवन। 
फिर से आया मेरा बचपन।। 
बादल जब जल को बरसाता,
गलियों में पानी भर जाता, 
गीला सा हो जाता आँगन। 
फिर से आया मेरा बचपन।। 
कागज की नौका बन जाती,
कभी डूबती और उतराती, 
ढलता जाता यों ही जीवन। 
फिर से आया मेरा बचपन।।

15 May, 2014

"शान्ति का कपोत बाज का शिकार हो गया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मखमली लिबास आज तार-तार हो गया! 
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!  

सभ्यताएँ मर गईं हैं, आदमी के देश में, 
क्रूरताएँ बढ़ गईं हैं, आदमी के वेश में, 
मौत की फसल उगी हैं, जीना भार हो गया! 
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!  

भोले पंछियों के पंख, नोच रहा बाज है, 
गुम हुए अतीत को ही, खोज रहा आज है,  
शान्ति का कपोत बाज का शिकार हो गया! 
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!  

पर्वतों से बहने वाली धार, मैली हो गईं, 
महक देने वाली गन्ध भी, विषैली हो गई, 
जिस सुमन पे आस टिकी, वो ही खार हो गया! 
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!

11 May, 2014

"ग़ज़ल-लगे खाने-कमाने में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

छलक जाते हैं अब आँसू, ग़ज़ल को गुनगुनाने में।
नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।

नदी-तालाब खुद प्यासे, चमन में घुट रही साँसें,
प्रभू के नाम पर योगी, लगे खाने-कमाने में।

हुए बेडौल तन, चादर सिमट कर हो गई छोटी,
शजर मशगूल हैं अपने फलों को आज खाने में।

दरकते जा रहे अब तो, हमारी नींव के पत्थर,
चिरागों ने लगाई आग, खुद ही आशियाने में।

लगे हैं पुण्य पर पहरे, दया के बन्द दरवाजे,
दुआएँ कैद हैं अब तो, गुनाहों की दुकानों में।

जिधर देखो उधर ही “रूप” का, सामान बिकता है,
रईसों के यहाँ अब, इल्म रहता पायदानों में।

07 May, 2014

"गीत-क्या हो गया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज मेरे देश को क्या हो गया है?
मख़मली परिवेश को क्या हो गया है??
पुष्प-कलिकाओं पे भँवरे, रात-दिन मँडरा रहे,
बागवाँ बनकर लुटेरे, वाटिका को खा रहे,
सत्य के उपदेश को क्या हो गया है?

मख़मली परिवेश को क्या हो गया है??
धर्म-मज़हब का हमारे देश में सम्मान है,
जियो-जीने दो, यही तो कुदरती फरमान है,
आज इस आदेश को क्या हो गया है?
मख़मली परिवेश को क्या हो गया है??

खोजते दैर-ओ-हरम में राम और रहमान को,
एकदेशी समझते हैं, लोग अब भगवान को,
धार्मिक सन्देश को क्या हो गया है?
मख़मली परिवेश को क्या हो गया है??

03 May, 2014

"गीत गाना जानते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत
"गीत गाना जानते हैं" 
वेदना की मेढ़ को पहचानते हैं।
हम विरह में गीत गाना जानते हैं।।

भावनाओं पर कड़ा पहरा रहा,
दुःख से नाता बहुत गहरा रहा,,
मीत इनको हम स्वयं का मानते हैं।
हम विरह में गीत गाना जानते हैं।।

रात-दिन चक्र चलता जा रहा 
वक्त ऐसे ही निकलता जा रहा
खाक दर-दर की नहीं हम छानते हैं।
हम विरह में गीत गाना जानते हैं।।

शूल के ही साथ रहते फूल हैं,
एक दूजे के लिए अनुकूल हैं,
बैर काँटों से नहीं हम ठानते हैं।
हम विरह में गीत गाना जानते हैं।।

29 April, 2014

"मोटा-झोटा कात रहा हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत
"मोटा-झोटा कात रहा हूँ" 
रुई पुरानी मुझे मिली है, 
मोटा-झोटा कात रहा हूँ।
मेरी झोली में जो कुछ है, 
वही प्यार से बाँट रहा हूँ।।

खोटे सिक्के जमा किये थे, 
मीत अजनबी बना लिए थे,
सम्बन्धों की खाई को मैं, 
खुर्पी लेकर पाट रहा हूँ।
मेरी झोली में जो कुछ है, 
वही प्यार से बाँट रहा हूँ।।

सुख का सूरज नजर न आता,
दुख का बादल हाड़ कँपाता,
नभ पर जमे हुए कुहरे को, 
दीप जलाकर छाँट रहा हूँ।
मेरी झोली में जो कुछ है, 
वही प्यार से बाँट रहा हूँ।।

आशाएँ हो गयी क्षीण हैं,
सरिताएँ जल से विहीन हैं,
प्यास बुझाने को मैं अपनी, 
तुहिन कणों को चाट रहा हूँ ।
मेरी झोली में जो कुछ है, 
वही प्यार से बाँट रहा हूँ।।

कैसे मैं वाटिका सजाऊँ,
नूतन बिम्ब कहाँ से लाऊँ,
जो कुछ बोया था खेतों में, 
उसको ही मैं काट रहा हूँ।
मेरी झोली में जो कुछ है, 
वही प्यार से बाँट रहा हूँ।।

25 April, 2014

"सिमट रही खेती" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत
"सिमट रही खेती" 
सब्जी, चावल और गेँहू की, सिमट रही खेती सारी।
शस्यश्यामला धरती पर, उग रहे भवन भारी-भारी।।

बाग आम के-पेड़ नीम के आँगन से  कटते जाते हैं,
जीवन देने वाले वन भी, दिन-प्रतिदिन घटते जाते है,
लगी फूलने आज वतन में, अस्त्र-शस्त्र की फुलवारी।
शस्यश्यामला धरती पर, उग रहे भवन भारी-भारी।।

आधुनिक कहलाने को,  पथ अपनाया हमने विनाश का,
अपनाकर पश्चिमीसभ्यता  नाम दिया हमने विकास का,
अपनी सरल-शान्त बगिया में सुलगा दी है चिंगारी।
शस्यश्यामला धरती पर, उग रहे भवन भारी-भारी।।

दूध-दही की दाता गइया, बिना घास के भूखी मरती,
कूड़ा खाने वाली मुर्गी, पुष्टाहार मजे से चरती,
सुख के सूरज की आशाएँ तकती कुटिया बेचारी।
शस्यश्यामला धरती पर, उग रहे भवन भारी-भारी।।

बालक तरसे मूँगफली को,  बिल्ले खाते हैं हलवा,
सत्ता की कुर्सी हथियाकर, काजू खाता है कलवा,
निर्धन कृषक कमाता माटी, दाम कमाता व्यापारी।
शस्यश्यामला धरती पर, उग रहे भवन भारी-भारी।।

मुख में राम बगल में चाकू, कर डाला बरबाद सुमन,
आचारों की सीख दे रहा, अनाचार का अब उपवन,
गरलपान करना ही अब तो जन-जन की है लाचारी।
शस्यश्यामला धरती पर, उग रहे भवन भारी-भारी।।

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