मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
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एक गीत
कहीं-कहीं छितराये बादल,
कहीं-कहीं गहराये बादल।
काले बादल, गोरे बादल,
अम्बर में मँडराये बादल।
उमड़-घुमड़कर, शोर मचाकर,
कहीं-कहीं बौराये बादल।
भरी दोपहरी में दिनकर को,
चादर से ढक आये बादल।
खूब खेलते आँख-मिचौली,
ठुमक-ठुमककर आये बादल।
दादुर, मोर, पपीहा को तो,
मेघ-मल्हार सुनाये बादल।
जिनके साजन हैं विदेश में,
उनको बहुत सताये बादल।
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02 February, 2014
"बादल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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गीत,
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