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28 February, 2014

"मनुजता की चूनरी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्यसंग्रह "धरा के रंग" से

मनुजता की चूनरी 
ज़िन्दगी हमारे लिए
आज भार हो गई! 
मनुजता की चूनरी तो
तार-तार हो गई!! 
हादसे सबल हुए हैं 
गाँव-गली-राह में 
खून से सनी हुई 
छुरी छिपी हैं बाँह में 
मौत ज़िन्दगी की 
रेल में सवार हो गई! 
मनुजता की चूनरी तो
तार-तार हो गई!! 

भागने की होड़ में
उखाड़ है-पछाड़ है
आज जोड़-तोड़ में
अजीब छेड़-छाड़ है
जीतने की चाह में
करारी हार हो गई!
मनुजता की चूनरी तो
तार-तार हो गई!! 

चीत्कार काँव-काँव 
छल रही हैं धूप-छाँव 
आदमी के ठाँव-ठाँव 
चल रहे हैं पेंच-दाँव 
सभ्यता के हाथ 
सभ्यता शिकार हो गई! 
मनुजता की चूनरी तो
तार-तार हो गई!! 

3 comments:

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