मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
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चलना ही है जीवन
जीवन पथ पर, आगे बढ़ते रहो हमेशा,
साहस से टल जायेंगी सारी ही उलझन। नदी और तालाब, यही देते हैं सन्देशा, रुकना तो सड़ना है, चलना ही है जीवन।। पोथी पढ़ने से जन पण्डित कहलाता है, बून्द-बून्द मिलकर ही सागर बन जाता है, प्यार रोपने से ही आता है अपनापन। रुकना तो सड़ना है, चलना ही है जीवन।। सर्दी,गर्मी, धरा हमेशा सहती है, अपना दुखड़ा नही किसी से कहती है, इसकी ही गोदी में पलते हैं वन कानन। रुकना तो सड़ना है, चलना ही है जीवन।। शीतल-मन्द-सुगऩ्ध बयारें चलकर आतीं, नभ से चल कर मस्त फुहारें जल बरसातीं, चलने से ही स्वस्थ हमेशा रहता तन-मन। रुकना तो सड़ना है, चलना ही है जीवन।। |
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25 January, 2014
"चलना ही है जीवन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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गीत,
चलना ही है जीवन
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