मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
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एक गीत
"आँसू और पसीना"
आँसू और पसीने में होती है बहुत रवानी।
दोंनो में ही बहता रहता खारा-खारा पानी।। दुख आता है तो रोने लगते हैं नयन सलोने, सुख में भी गीले हो जाते हैं आँखों के कोने, हाव-भाव से पहचानी जाती है छिपी कहानी। दोंनो में ही बहता रहता खारा-खारा पानी।। खारा पानी तो मेहनत की स्वयं गवाही देता, मोती जैसा तन पर श्रम का स्वेद दिखाई देता, सारा भेद खोल देती है पल-भर में पेशानी। दोंनो में ही बहता रहता खारा-खारा पानी।। ज्वार सिन्धु में आने पर वह शान्त नही रहता है, समझाने पर नेत्र अश्रु का भार नहीं सहता है, मुखड़े पर छाई रहती है इनकी सदा निशानी। दोंनो में ही बहता रहता खारा-खारा पानी।। |
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12 January, 2014
"आँसू और पसीना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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