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04 July, 2022

गीत "संसार सुहाना लगता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वक्त सही हो तो सारासंसार सुहाना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भीबेगाना लगता है।।
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यदि अपने घर व्यंजन हैंतो बाहर घी की थाली है,
भिक्षा भी मिलनी मुश्किलयदि अपनी झोली खाली है,
गूढ़ वचन भी निर्धन काजग को बचकाना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भीबेगाना लगता है।।
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फूटी किस्मत हो तोगम की भीड़ नजर आती है,
कालीनों को बोरों कीकब पीड़ नजर आती है,
कलियों को खिलते फूलों का रूप पुराना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भीबेगाना लगता है।।
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धूप-छाँव जैसाअच्छा और बुरा हाल आता है,
बारह मास गुजर जाने परनया साल आता है,
खुशियाँ पा जाने पर ही अच्छा मुस्काना लगता है।
बुरे वक्त में अपना साया भीबेगाना लगता है।।
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4 comments:

  1. कलियों को फूलों का रूप पुराना लगता है .... बहुत खूबसूरत रचना ।।

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  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार(०५-०७ -२०२२ ) को
    'मचलती है नदी'( चर्चा अंक-४४८१)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  3. सार जर्भित अभिव्यक्ति।

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  4. हमारे-आपके दिन बुरे हो सकते हैं लेकिन भारत के दिन अच्छे चल रहे हैं.

    ReplyDelete

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