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जलने को परवाने आतुर, आशा के दीप जलाओ तो।
कब से बैठे प्यासे चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।। मधुवन में महक समाई है, कलियों में यौवन सा छाया, मस्ती में दीवाना होकर, भँवरा उपवन में मँडराया, वह झूम रहा होकर व्याकुल, तुम पंखुरिया फैलाओ तो। कब से बैठे प्यासे चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।। मधुमक्खी भीने-भीने स्वर में, सुन्दर गीत सुनाती है, सुन्दर पंखों वाली तितली भी, आस लगाए आती है, सूरज की किरणें कहती है, कलियों खुलकर मुस्काओ तो। कब से बैठे प्यासे चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।। मधु का कण भर इनको मत दो, पर आमन्त्रण तो दे दो, पहचानापन विस्मृत करके, इक मौन-निमन्त्रण तो दे दो, काली घनघोर घटाओं में, बिजली बन कर आ जाओ तो। कब से बैठे प्यासे चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।। |
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26 September, 2014
‘‘आशा के दीप जलाओ’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
लेबल:
आशा के दीप,
गीत
13 July, 2014
"बादल का चित्रगीत" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
एक गीत
बादल का चित्रगीत
कहीं-कहीं छितराये बादल,
कहीं-कहीं गहराये बादल।
काले बादल, गोरे बादल,
अम्बर में मँडराये बादल।
उमड़-घुमड़कर, शोर मचाकर,
कहीं-कहीं बौराये बादल।
भरी दोपहरी में दिनकर को,
चादर से ढक आये बादल।
खूब खेलते आँख-मिचौली,
ठुमक-ठुमककर आये बादल।
दादुर, मोर, पपीहा को तो,
मेघ-मल्हार सुनाये बादल।
जिनके साजन हैं विदेश में,
उनको बहुत सताये बादल।
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लेबल:
गीत,
बादल का चित्रगीत
27 June, 2014
(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’) "पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा"
मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
एक गीत
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा
कंकड़ को भगवान मान लूँ,
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा!
काँटों को वरदान मान लूँ,
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा!
दुर्गम पथ, बन जाये सरल सा,
अमृत घट बन जाए, गरल का,
पीड़ा को मैं प्राण मान लूँ.
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा!
बेगानों से प्रीत लगा लूँ,
अनजानों को मीत बना लूँ,
आशा को परिमाण मान लूँ,
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा!
रीते जग में मन भरमाया,
जीते जी माया ही माया,
साधन को संधान मान लूँ,
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा!
मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
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एक गीत
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा
कंकड़ को भगवान मान लूँ,
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा!
काँटों को वरदान मान लूँ,
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा!
दुर्गम पथ, बन जाये सरल सा,
अमृत घट बन जाए, गरल का,
पीड़ा को मैं प्राण मान लूँ.
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा!
बेगानों से प्रीत लगा लूँ,
अनजानों को मीत बना लूँ,
आशा को परिमाण मान लूँ,
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा!
रीते जग में मन भरमाया,
जीते जी माया ही माया,
साधन को संधान मान लूँ,
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा!
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24 June, 2014
"आज से ब्लॉगिंग बन्द" (डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक')
मित्रों।
फेस बुक पर मेरे मित्रों में एक श्री केवलराम भी हैं।
उन्होंने मुझे चैटिंग में आग्रह किया कि उन्होंने एक ब्लॉगसेतु के नाम से एग्रीगेटर बनाया है। अतः आप उसमें अपने ब्लॉग जोड़ दीजिए।
मैेने ब्लॉगसेतु का स्वागत किया और ब्लॉगसेतु में अपने ब्लॉग जोड़ने का प्रयास भी किया। मगर सफल नहीं हो पाया। शायद कुछ तकनीकी खामी थी।
श्री केवलराम जी ने फिर मुझे याद दिलाया तो मैंने अपनी दिक्कत बता दी।
इन्होंने मुझसे मेरा ईमल और उसका पासवर्ड माँगा तो मैंने वो भी दे दिया।
इन्होंने प्रयास करके उस तकनीकी खामी को ठीक किया और मुझे बता दिया कि ब्लॉगसेतु के आपके खाते का पासवर्ड......है।
मैंने चर्चा मंच सहित अपने 5 ब्लॉगों को ब्लॉग सेतु से जोड़ दिया।
ब्लॉगसेतु से अपने 5 ब्लॉग जोड़े हुए मुझे 5 मिनट भी नहीं बीते थे कि इन महोदय ने कहा कि आप ब्लॉग मंच को ब्लॉग सेतु से हटा लीजिए।
मैंने तत्काल अपने पाँचों ब्लॉग ब्लॉगसेतु से हटा लिए।
अतः बात खत्म हो जानी चाहिए थी।
---
कुछ दिनों बाद मुझे मेल आयी कि ब्लॉग सेतु में ब्लॉग जोड़िए।
मैंने मेल का उत्तर दिया कि इसके संचालक भेद-भाव रखते हैं इसलिए मैं अपने ब्लॉग ब्लॉग सेतु में जोड़ना नहीं चाहता हूँ।
--
बस फिर क्या था श्री केवलराम जी फेसबुक की चैटिंग में शुरू हो गये।
--
यदि मुझसे कोई शिकायत थी तो मुझे बाकायदा मेल से सूचना दी जानी चाहिए थी । लेकिन ऐसा न करके इन्होंने फेसबुक चैटिंग में मुझे अप्रत्यक्षरूप से धमकी भी दी।
एक बानगी देखिए इनकी चैटिंग की....
"Kewal Ram
आदरणीय शास्त्री जी
जैसे कि आपसे संवाद हुआ था और आपने यह कहा था कि आप मेल के माध्यम से उत्तर दे देंगे लेकिन आपने अभी तक कोई मेल नहीं किया
जिस तरह से बिना बजह आपने बात को सार्जनिक करने का प्रयास किया है उसका मुझे बहुत खेद है
ब्लॉग सेतु टीम की तरफ से फिर आपको एक बार याद दिला रहा हूँ
कि आप अपनी बात का स्पष्टीकरण साफ़ शब्दों में देने की कृपा करें
कोई गलत फहमी या कोई नाम नहीं दिया जाना चाहिए
क्योँकि गलत फहमी का कोई सवाल नहीं है
सब कुछ on record है
इसलिए आपसे आग्रह है कि आप अपन द्वारा की गयी टिप्पणी के विषय में कल तक स्पष्टीकरण देने की कृपा करें 24/06/2014
7 : 00 AM तक
अन्यथा हमें किसी और विकल्प के लिए बाध्य होना पडेगा
जिसका मुझे भी खेद रहेगा
अपने **"
--
ब्लॉग सेतु के संचालकों में से एक श्री केवलराम जी ने मुझे कानूनी कार्यवाही करने की धमकी देकर इतना बाध्य कर दिया कि मैं ब्लॉगसेतु के संचालकों से माफी माँगूँ।
जिससे मुझे गहरा मानसिक आघात पहुँचा है।
इसलिए मैं ब्लॉगसेतु से क्षमा माँगता हूँ।
साथ ही ब्लॉगिंग भी छोड़ रहा हूँ। क्योंकि ब्लॉग सेतु की यही इच्छा है कि जो ब्लॉगर प्रतिदिन अपना कीमती समय लगाकर हिन्दी ब्लॉगिंग को समृद्ध कर रहा है वो आगे कभी ब्लॉगिंग न करे।
मैंने जीवन में पहला एग्रीगेटर देखा जिसका एक संचालक बचकानी हरकत करता है और फेसबुक पर पहल करके चैटिंग में मुझे हमेशा परेशान करता है।
उसका नाम है श्री केवलराम, हिन्दी ब्लॉगिंग में पी.एचडी.।
इस मानसिक आघात से यदि मुझे कुछ हो जाता है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी ब्लॉगसेतु और इससे जुड़े श्री केवलराम की होगी।
आज से ब्लॉगिंग बन्द।
और इसका श्रेय ब्लॉगसेतु को।
जिसने मुझे अपना कीमती समय और इंटरनेट पर होने वाले भारी भरकम बिल से मुक्ति दिलाने में मेरी मदद की।
धन्यवाद।
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक"
15 June, 2014
"अमलतास के पीले झूमर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
लेबल:
. धरा के रंग,
अमलतास के पीले झूमर,
कविता
05 June, 2014
"मखमली लिबास" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
एक गीत
"मखमली लिबास"
मखमली लिबास आज तार-तार हो गया!
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!
सभ्यताएँ मर गईं हैं, आदमी के देश में,
क्रूरताएँ बढ़ गईं हैं, आदमी के वेश में,
मौत की फसल उगी हैं, जीना भार हो गया!
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!
भोले पंछियों के पंख, नोच रहा बाज है,
गुम हुए अतीत को ही, खोज रहा आज है,
शान्ति का कपोत बाज का शिकार हो गया!
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!
पर्वतों से बहने वाली धार, मैली हो गईं,
महक देने वाली गन्ध भी, विषैली हो गई,
जिस सुमन पे आस टिकी, वो ही खार हो गया!
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!
मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
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एक गीत
"मखमली लिबास"
मखमली लिबास आज तार-तार हो गया!
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!
सभ्यताएँ मर गईं हैं, आदमी के देश में,
क्रूरताएँ बढ़ गईं हैं, आदमी के वेश में,
मौत की फसल उगी हैं, जीना भार हो गया!
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!
भोले पंछियों के पंख, नोच रहा बाज है,
गुम हुए अतीत को ही, खोज रहा आज है,
शान्ति का कपोत बाज का शिकार हो गया!
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!
पर्वतों से बहने वाली धार, मैली हो गईं,
महक देने वाली गन्ध भी, विषैली हो गई,
जिस सुमन पे आस टिकी, वो ही खार हो गया!
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!
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23 May, 2014
"कठिन बुढ़ापा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
एक कविता
कितना है नादान मनुज, यह चक्र समझ नही पाया।
अंग शिथिल हैं, दुर्बल तन है, रसना बनी सबल है।
आशाएँ और अभिलाषाएँ, बढ़ती जाती प्रति-पल हैं।।
धीरज और विश्वास संजो कर, रखना अपने मन में।
रंग-बिरंगे सुमन खिलेंगे, घर, आंगन, उपवन में।।
यही बुढ़ापा अनुभव के, मोती लेकर आया है।
नाती-पोतों की किलकारी, जीवन में लाया है।।
मतलब की दुनिया मे, अपने कदम संभल कर धरना।
वाणी पर अंकुश रखना, टोका-टाकी मत करना।।
देख-भालकर, सोच-समझकर, ही सारे निर्णय लेना।
भावी पीढ़ी को उनका, सुखमय जीवन जीने देना।।
मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
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एक कविता
कितना है नादान मनुज, यह चक्र समझ नही पाया।
अंग शिथिल हैं, दुर्बल तन है, रसना बनी सबल है।
आशाएँ और अभिलाषाएँ, बढ़ती जाती प्रति-पल हैं।।
धीरज और विश्वास संजो कर, रखना अपने मन में।
रंग-बिरंगे सुमन खिलेंगे, घर, आंगन, उपवन में।।
यही बुढ़ापा अनुभव के, मोती लेकर आया है।
नाती-पोतों की किलकारी, जीवन में लाया है।।
मतलब की दुनिया मे, अपने कदम संभल कर धरना।
वाणी पर अंकुश रखना, टोका-टाकी मत करना।।
देख-भालकर, सोच-समझकर, ही सारे निर्णय लेना।
भावी पीढ़ी को उनका, सुखमय जीवन जीने देना।।
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लेबल:
. धरा के रंग,
कठिन बुढ़ापा,
कविता
19 May, 2014
"फिर से आया मेरा बचपन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
एक गीत
"फिर से आया मेरा बचपन"
जब से उम्र हुई है पचपन।
फिर से आया मेरा बचपन।।
पोती-पोतों की फुलवारी,
महक रही है क्यारी-क्यारी,
भरा हुआ कितना अपनापन।
फिर से आया मेरा बचपन।।
इन्हें मनाना अच्छा लगता,
कथा सुनाना अच्छा लगता,
भोला-भाला है इनका मन।
फिर से आया मेरा बचपन।।
मुन्नी तुतले बोल सुनाती,
मिश्री कानों में घुल जाती,
चहक रहा जीवन का उपवन।
फिर से आया मेरा बचपन।।
बादल जब जल को बरसाता,
गलियों में पानी भर जाता,
गीला सा हो जाता आँगन।
फिर से आया मेरा बचपन।।
कागज की नौका बन जाती,
कभी डूबती और उतराती,
ढलता जाता यों ही जीवन।
फिर से आया मेरा बचपन।।
मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
![]()
एक गीत
"फिर से आया मेरा बचपन"
![]()
जब से उम्र हुई है पचपन।
फिर से आया मेरा बचपन।। पोती-पोतों की फुलवारी, महक रही है क्यारी-क्यारी, भरा हुआ कितना अपनापन। फिर से आया मेरा बचपन।। इन्हें मनाना अच्छा लगता, कथा सुनाना अच्छा लगता, भोला-भाला है इनका मन। फिर से आया मेरा बचपन।। मुन्नी तुतले बोल सुनाती, मिश्री कानों में घुल जाती, चहक रहा जीवन का उपवन। फिर से आया मेरा बचपन।। बादल जब जल को बरसाता, गलियों में पानी भर जाता, गीला सा हो जाता आँगन। फिर से आया मेरा बचपन।। कागज की नौका बन जाती, ढलता जाता यों ही जीवन। फिर से आया मेरा बचपन।। |
लेबल:
. धरा के रंग,
गीत,
फिर से आया मेरा बचपन
15 May, 2014
"शान्ति का कपोत बाज का शिकार हो गया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मखमली लिबास आज तार-तार हो गया!
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!! सभ्यताएँ मर गईं हैं, आदमी के देश में, क्रूरताएँ बढ़ गईं हैं, आदमी के वेश में, मौत की फसल उगी हैं, जीना भार हो गया! मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!! भोले पंछियों के पंख, नोच रहा बाज है, गुम हुए अतीत को ही, खोज रहा आज है, शान्ति का कपोत बाज का शिकार हो गया! मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!! पर्वतों से बहने वाली धार, मैली हो गईं, महक देने वाली गन्ध भी, विषैली हो गई, जिस सुमन पे आस टिकी, वो ही खार हो गया! मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!! |
11 May, 2014
"ग़ज़ल-लगे खाने-कमाने में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
छलक जाते हैं अब आँसू, ग़ज़ल को गुनगुनाने में।
नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।
नदी-तालाब खुद प्यासे, चमन में घुट रही साँसें,
प्रभू के नाम पर योगी, लगे खाने-कमाने में।
हुए बेडौल तन, चादर सिमट कर हो गई छोटी,
शजर मशगूल हैं अपने फलों को आज खाने में।
दरकते जा रहे अब तो, हमारी नींव के पत्थर,
चिरागों ने लगाई आग, खुद ही आशियाने में।
लगे हैं पुण्य पर पहरे, दया के बन्द दरवाजे,
दुआएँ कैद हैं अब तो, गुनाहों की दुकानों में।
जिधर देखो उधर ही “रूप” का, सामान बिकता है,
रईसों के यहाँ अब, इल्म रहता पायदानों में।
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लेबल:
. धरा के रंग,
ग़ज़ल,
लगे खाने-कमाने में
07 May, 2014
"गीत-क्या हो गया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
आज मेरे
देश को क्या हो गया है?
मख़मली
परिवेश को क्या हो गया है??
पुष्प-कलिकाओं
पे भँवरे, रात-दिन
मँडरा रहे,
बागवाँ
बनकर लुटेरे, वाटिका को
खा रहे,
सत्य के
उपदेश को क्या हो गया है?
मख़मली
परिवेश को क्या हो गया है??
धर्म-मज़हब
का हमारे देश में सम्मान है,
जियो-जीने
दो, यही तो
कुदरती फरमान है,
आज इस
आदेश को क्या हो गया है?
मख़मली
परिवेश को क्या हो गया है??
खोजते
दैर-ओ-हरम में राम और रहमान को,
एकदेशी
समझते हैं, लोग अब
भगवान को,
धार्मिक
सन्देश को क्या हो गया है?
मख़मली
परिवेश को क्या हो गया है??
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लेबल:
. धरा के रंग,
क्या हो गया है,
गीत
03 May, 2014
"गीत गाना जानते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत
![]()
"गीत गाना जानते हैं"
वेदना की मेढ़
को पहचानते हैं।
हम विरह में गीत गाना जानते हैं।। भावनाओं पर कड़ा पहरा रहा,
दुःख से नाता बहुत गहरा रहा,,
मीत इनको हम स्वयं का मानते हैं।
हम विरह में गीत गाना जानते हैं।। रात-दिन चक्र चलता जा रहा
वक्त ऐसे ही निकलता जा रहा
खाक दर-दर की नहीं हम छानते हैं। हम विरह में गीत गाना जानते हैं।। शूल के ही साथ रहते फूल हैं,
एक दूजे के लिए अनुकूल हैं,
बैर काँटों से नहीं हम ठानते हैं। हम विरह में गीत गाना जानते हैं।। |
लेबल:
. धरा के रंग,
गीत,
गीत गाना जानते हैं
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