![]()
"कभी न भूलें सावन में"
पेंग बढ़ाकर नभ को छू लें, झूला झूलें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।। मँहगाई की मार पड़ी है, घी और तेल हुए महँगे, कैसे तलें पकौड़ी अब, पापड़ क्या भूनें सावन में। मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।। हरियाली तीजों पर, कैसे लायें चोटी-बिन्दी को, सूखे मौसम में कैसे, अब सजें-सवाँरे सावन में। मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।। आँगन से कट गये नीम,बागों का नाम-निशान मिटा, रस्सी-डोरी के झूले, अब कहाँ लगायें सावन में। मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।। |
Followers
Showing posts with label गीत. धरा के रंग. Show all posts
Showing posts with label गीत. धरा के रंग. Show all posts
22 August, 2013
"कभी न भूलें सावन में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
लेबल:
कभी न भूलें सावन में,
गीत,
गीत. धरा के रंग
02 August, 2013
"हमारी मातृभाषा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]() ![]()
ये हमारी तरह है सरल औ' सुगम,
सारे संसार में इसका सानी नहीं।
जो लिखा है उसी को पढ़ो मित्रवर,
बोलने में कहीं बेईमानी नहीं।
BUT व PUT का नहीं भेद इसमें भरा,
धाँधली की कहीं भी निशानी नहीं।
व्याकरण में भरा पूर्ण विज्ञान है,
जोड़ औ' तोड़ की कुछ कहानी नहीं।
सन्धि नियमों में पूरी उतरती खरी,
मातृभाषा हमारी बिरानी नहीं।
मेरे भारत की भाषाएँ फूलें-फलें,
हमको सन्तों की वाणी भुलानी नहीं।
"रूप" इसका सँवारें सकल विश्व में,
रुकने पाए हमारी रवानी नहीं।
|
लेबल:
गीत. धरा के रंग,
हमारी मातृभाषा
29 July, 2013
"हो गया है साफ अम्बर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]() ![]() |
ढल गई बरसात अब तो, हो गया है साफ अम्बर।
खिल उठी है चिलचिलाती, धूप फिर से आज भू पर।।
उमस ने सुख-चैन छीना,
हो गया दुश्वार जीना,
आ रहा फिर से पसीना, तन-बदन पर।
खिल उठी है चिलचिलाती, धूप फिर से आज भू पर।।
हरितिमा होती सुनहरी जा रही.
महक खेतों से सुगन्धित आ रही,
धान के बिरुओं ने पहने आज झूमर।
खिल उठी है चिलचिलाती, धूप फिर से आज भू पर।।
ढल रहा गर्मी का यौवन जानते सब,
कुछ दिनों में सर्द मौसम आयेगा जब,
फिर निकल आयेंगे स्वेटर और मफलर।
खिल उठी है चिलचिलाती, धूप फिर से आज भू पर।।
|
Subscribe to:
Posts (Atom)


