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17 December, 2011

"धरा के रंग" की सामग्री-1 (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मित्रों !
नवम्बर, 2011 में प्रकाशित अपने कविता संग्रह 
"धरा के रंग" की सामग्री को क्रमशः प्रकाशित करूँगा। 
मुझे विश्वास है कि इस पुस्तक की कविताएँ आप तक पहुँचेंगी 
और आपका स्नेह मुझे प्राप्त होगा।
भूमिका 
जीवन के विविध रंगों में रंगी
धरा का प्रभावशाली चित्रण
डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक के गीतों और गजलों का यह संग्रह अपनी रचनाओं की सहज शब्दावली व मधुर संरचनाओं के कारण विशेषरूप से आकर्षित करता है। अपने नाम धरा के रंग को सार्थक करते इस संग्रह में ऐसे रचनाकार के दर्शन होते हैं जो प्रकृति की आकर्षक काल्पनाओं में उड़ता तो है पर उसके पैर सदा सत्य की मजबूत धरा पर टिके रहते हैं। संग्रह में जीवन के विविध रंगों को शब्द मिले हैं और विविध आयामों से इन्हें परखा गया है।
एक ओर जहाँ वेदना, ईमान, स्वार्थ, बचपन, एकता, मनुजता आदि अमूर्त मानवीय संवेदनाओं पर कवि की संवेदना बिखरती है तो दूसरी ओर प्राकृतिक उपादानों को रचनाकार ने अपनी रचना का विषय बनाया है। इसके अतिरिक्त प्रेम के विभिन्न रूपों को भी उनकी रचनाओं में विस्तार मिला है। वे अपने परिवेश की सामाजिक समस्याओं से भी अछूते नहीं रहे हैं। कन्याभ्रूण हत्या जैसी ज्वलंत समस्या को उठाते हुए वे लिखते हैं-
बेटों की चाहत में मैया!
क्यों बेटी को मार रही हो?
नारी होकर भी हे मैया!
नारी को दुत्कार रही हो,
माता मुझको भी तो अपना
जन-जीवन पनपाने दो!
माता मुझको भी तो
अपनी दुनिया में आने दो!
वे सहज निश्छल जीवन के प्रति समर्पित हैं तथा आधुनिक समाज के बनावटी आभिजात्य को बड़ी विनम्रता से खारिज करते हुए भोलेपन की पक्षधरता करते हुए कहते हैं-
जब भी सुखद-सलोने सपने,
नयनों में छा आते हैं।
गाँवों के निश्छल जीवन की,
हमको याद दिलाते हैं।

या फिर-

पागलपन में भोलापन हो!
ऐसा पागलपन अच्छा है!!
समाज में एकता के महत्व पर बात करते हुए वे कहते हैं-
एकता से बढ़ाओ मिलाकर कदम
रास्ते हँसते-हँसते ही कट जायेंगे।
देश के प्रति चिंतित होते हुए वे कहते हैं-
आज मेरे देश को क्या हो गया है?
          और अति आधुनिकता के प्रति-
उड़ा ले गई पश्चिम वाली,
आँधी सब लज्जा-आभूषण,
इस संग्रह की रचनाएँ न केवल सामाजिक समस्याओं को इंगित करती हैं बल्कि उनका एक समुचित हल भी प्रस्तुत करती हैं। अधिकतर स्थानों पर कवि ने बेहतर समाज के निर्माण की गुहार करते हुए आशावादी दृष्टिकोण अपनाया हैं। इस संग्रह की उनकी रचनाओं को विषयों के आधार पर चार श्रेणियों में बाँटा जा सकता है-
सामाजिक समस्याओं की कविताएँ,
प्रकृति की कविताएँ,
प्रेम की कविताएँ
और मानवीय संवेदनाओं की कविताएँ ।
ऐसा नहीं है कि हर रचना को किसी न किसी श्रेणी के ऊपर लिखा गया है बल्कि ये स्वाभाविक रूप से उनकी रचनाओं में उपस्थित हुई हैं। यही कारण है कि कभी कभी एक ही रचना को एक से अधिक श्रेणियों में रखा जा सकता है। जो प्रकृति कवियों की सबसे बड़ी प्रेरणा स्रोत है। मयंक जी भी इससे अछूते नहीं रहे हैं। उन्हें सबसे अधिक वर्षाऋतु लुभाती है और उसमें भी बादल। इसके सुंदर चित्र उनकी रचनाओं में देखे जा सकते हैं। इसी प्रकार वे वर्षा के साथ अपने बचपन को याद करते हुए कहते हैं-
बादल जब जल को बरसाता,
गलियों में पानी भर जाता,
गीला सा हो जाता आँगन।
एक और रचना में वे वर्षा को इस प्रकार याद करते हैं-
बारिश का सन्देशा लाये!!
नभ में काले बादल छाये!
जल से भरा धरा का कोना,
हरी घास का बिछा बिछौना,
खुश होकर मेंढक टर्राए!
नभ में काले बादल छाये!
उन्हें पेड़ों से गहरा लगाव है और आम, नीम, जामुन आदि पेड़ों के नाम सहजता से उनकी रचनाओं में आते हैं। अमलतास पर उनकी एक बड़ी लुभावनी रचना इस संग्रह में है जिसमें उन्होंने फूलों के गुच्छे को झूमर की उपमा दी है-
अमलतास के झूमर की, आभा-शोभा न्यारी है।
मनमोहक मुस्कान तुम्हारी, सबको लगती प्यारी है।।
मयंक जी की रचनाएँ प्रेम के आदर्शवादी स्वरूप की छटा प्रस्तुत करती हैं। वे अपनेपन के लिये प्रेम को रोपना आवश्यक समझते हैं। प्रेम के बिना न फूल खिलते हैं, न हवा में महक होती है, न घर होता है और न सृजन। प्रेम के बिना अदावत, बगावत, शिकवा, शिकायत कुछ भी नहीं होता। विरह के गीत भी तो प्रेम के कारण ही जन्म लेते हैं। प्रेम को जग का आधरभूत तत्व मानते हुए वे कहते हैं-
अगर दिलदार ना होता!
जहाँ में प्यार ना होता!!
न होती सृष्टि की रचना,
न होता धर्म का पालन।
न होती अर्चना पूजा,
न होता लाड़ और लालन।
अगर परिवार ना होता!
जहाँ में प्यार ना होता!!
उनकी रचनाओं में वर्णित प्रेम ऐसा अमृत है जिसके बरसने से ऋतुएँ आती-जाती हैं, ठूँठ हरे हो जाते हैं और देश के लिये वीर अपना शीश चढ़ाकर अमर हो जाते हैं। प्रेम रस में डूबकर तो सभी अभिभूत हो जाते हैं-
तुमने अमृत बरसाया तो,
मैं कितना अभिभूत हो गया!
कहीं यह प्रेम चंदा-चकोरी है तो कहीं सागर का मोती। बड़ी तल्लीनता से कवि कहता है-
तुम मनको पढ़कर देखो तो!
कुछ आगे बढ़कर देखो तो!!
प्रेम की आवश्यकता और व्यग्रता उनकी रचना प्यार तुम्हारा में देखने को मिलती है-
कंकड़ को भगवान मान लूँ,
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा!
काँटों को वरदान मान लूँ,
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा!
या फिर-
आप इक बार ठोकर से छू लो हमें,
हम कमल हैं चरण-रज से खिल जायेगें!

मयंक जी की रचनाओं में ईमान, गरीबी, सद्भावना, चैन, आराम, बचपन का भोलापन आदि मानवीय संबंधों की बहुआयामी पड़ताल मिलती है। जीवन के चक्र के प्रति उनकी अद्भुत दृष्टि मिलती है जिसे वे चक्र समझ नहीं पाया में सहजता से समझा देते हैं। वे धैर्य को जीवन का बहुमूल्य तत्व मानते हुए हर किसी से, हर समय सुविधा की अपेक्षा करने को गलत ठहराते हैं और क्रूरता, असंवेदनशीलता, अशांति आदि के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए कहते हैं-
शान्ति का कपोत बाज का शिकार हो गया!
और शुभता की मंगलकामना करते हुए-
आँसू हैं अनमोल,
इन्हें बेकार गँवाना ठीक नही!
हैं इनका कुछ मोल,
इन्हें बे-वक्त बहाना ठीक नही!
दिन प्रतिदिन मुश्किल होते हुए जीवन के प्रति वे कहते हैं-
छलक जाते हैं अब आँसू, गजल को गुनगुनाने में।
नहीं है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।
नदी-तालाब खुद प्यासे, चमन में घुट रही साँसें,
प्रभू के नाम पर योगी, लगे खाने-कमाने में।
दुनिया से गुम होते ईमान के लिये उनके शब्द कुछ इस प्रकार आकार लेते है-
ईमान ढूँढने निकला हूँ, मैं मक्कारों की झोली में।
बलवान ढूँढने निंकला हूँ, मैं मुर्दारों की टोली में।
ताल ठोंकता काल घूमता, बस्ती और चैराहों पर,
कुछ प्राण ढूँढने निकला हूँ, मैं गद्दारों की गोली में।
सुंदर सजीव चित्रात्मक भाषा वाली ये रचनाएँ संवेदनशीलता के मर्म में डुबोकर लिखी गई हैं। आशा है कहीं न कहीं ये हर पाठक को गहराई से छुएँगी।
इस सुंदर संग्रह के लिये डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
विजयदशमी 2011
-पूर्णिमा वर्मन
पी.ओ. बाक्स 25450,
शारजाह, संयुक्त अरब इमीरात
:ःःःःःःःःः
‘धरा के रंग’ 
पठनीय ही नहीं, संग्रहणीय भी है।
डॉ. गंगाधर राय
साहित्य और समाज में अविछिन्न संबंध् रहा है। समाज में व्याप्त आकांक्षाएँ, कुंठाएँ, मूल्य और विसंगतियाँ साहित्यकारों की भाव संवेदना को उभारकर उन्हें रचना के लिए उत्प्रेरित करती है। 
गंभीर प्रकृति की कविताएँ लिखनेवाले लोगों ने, चाहे वे भले ही आम आदमी के सवालों को उठाते आए हों, परंतु उन्होंने कविता के शिल्प से लेकर भाषा-शैली तथा प्रवाह को इतना क्लिष्ट बना दिया है कि उसे जनसामान्य तो क्या, साहित्य के चतुर चितेरे भी उसे समझने में अपने आपको असमर्थ पाते हैं। ऐसे में डॉ. रूपचंद्र शास्त्री ‘मयंक’ जी का यह काव्य-संग्रह ‘धरा के रंग’ की भाषा बड़ी ही सहज, सरल एवं बोध्गम्य है, साथ ही प्रशंसनीय भी। 
कवि मयंक जी का मातृभाषा के प्रति प्रेम सहज ही छलक उठता है - 
जो लिखा है उसी को पढ़ो मित्रवर,
बोलने में कहीं बेईमानी नहीं।
व्याकरण में भरा पूर्ण विज्ञान है,
जोड़ औ’ तोड़ की कुछ कहानी नहीं।
डॉ0 शास्त्री वर्ष में एक बार मनाई जाने वाली आजादी की वर्षगाँठ से व्यथित नजर आते हैं। आपका मानना है कि जिस तरह हम अपने आराध्य को प्रतिदिन वंदन और नमन करते हैं उसी तरह हमें आजादी के रणबाँकुरों को प्रतिदिन सम्मान देना चाहिए - 
आओ अमर शहीदों का, 
हम प्रतिदिन वन्दन-नमन करें,
आजादी की वर्षगाँठ तो, 
एक साल में आती है।
‘लेकर आऊँगा उजियारा’ कविता के माध्यम से कवि मयंक ने यह विश्वास दिलाया है कि एक न एक दिन सबके जीवन में उजाला अवश्य आएगा। गँवई, गाँव-जमीन से जुड़ा हुआ कवि कृषि प्रधान देश में कृषि योग्य भूमि पर कंकरीट के जंगलों ; बहुमंजिली इमारतों को देखकर चिंतित होते हुए लिखते हैं - 
 सब्जी, चावल और गेंहू की, 
सिमट रही खेती सारी। 
शस्यश्यामला धरती पर,
उग रहे भवन भारी-भारी।। 
डॉ. शास्त्री शहर के कोलाहलपूर्ण एवं प्रदूषित वातावरण को देखते हुए आम जनमानस से नगर का मोह छोड़कर गाँव चलने का आह्नान करते हुए लिखते हैं- 
छोड़ नगर का मोह,
आओ चलें गाँव की ओर!
मन से त्यागें ऊहापोह,
आओ चलें गाँव की ओर!
अपनी कविताओं के माध्यम से मयंक जी ने मानवता के विकास के लिए स्वप्नलोक में विचरण करना आवश्यक बताया है तथा चलना ही जीवन है के सिद्धांत पर ‘चरैवेति चरैवेति’ का संदेश भी दिया है। 
‘धरा के रंग’ काव्य-संग्रह की एक रचना ‘बेटी की पुकार’ में कवि ने कन्या भ्रूणहत्या जैसी सामाजिक बुराई पर गहरी दृष्टि डाली है। स्त्री-पुरुष लिंगानुपात कवि का चिंतनीय वर्ण्य विषय है। 
समाज में समाप्त हो रहे आपसी सौहार्द्र, भाईचारा, प्रेम, सहयोग से उत्पन्न विषम परिस्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कवि मयंक ने ‘पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा’ लिखकर यह संदेश देना चाहा है कि ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडितहोय। प्रेम असंभव को भी संभव बना देता है-
कंकड़ को भगवान मान लूँ, 
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा! 
काँटों को वरदान मान लूँ, 
पा जाऊँ यदि प्यार तुम्हारा! 
कुल मिलाकर प्रस्तुत काव्य-संग्रह ‘धरा के रंग’ केवल पठनीय ही नहीं वरन् संग्रहणीय भी है। नयनाभिराम मुखपृष्ठ, स्तरीय सामग्री तथा निर्दोष मुद्रण सभी दृष्टियों से यह स्वागत योग्य है। मुझे विश्वास है कि मयंक जी इसी प्रकारअधिकाधिक एवं उत्तमोत्तम ग्रंथों की रचना कर हिंदी की सेवा में अग्रणी बनेंगे।
-डॉ. गंगाधर राय 
संस्कार भारती, संभाग संयोजक, कुमाऊँ मंडल, उत्तराखंड
टीचर्स कॉलोनी, खटीमा, उत्तराखंड - 262308.

क्रमशः.............

20 October, 2011

"हिन्दी ब्लॉगिंग का इतिहास : एक समीक्षा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

हिन्दी ब्लॉगिंग का इतिहास : एक समीक्षा
छः महीनों के लम्बे इन्तज़ार के बाद प्रियवर रवीन्द्र प्रभात जी द्वारा लिखित और हिन्दी साहित्य निकेतन, बिजनौर द्वारा प्रकाशित पुस्तक हिन्दी ब्लॉगिंग का इतिहास मुझे प्राप्त हुई। जिसको बहुत ही परिश्रम के साथ हिन्दी ब्लॉगिंग के शैशवकाल से लेकर जवान होने तक के काल को विद्वान लेखक ने दर्शाया है।
समीक्षा की दृष्टि से यदि देखा जाए तो इसमें कुछ लोगों की गतिविधियों को तो अनावश्यकरूप से बहुत बढ़ा-चढ़ा कर भी प्रस्तुत किया है और इसमें कोई हानि भी नहीं है। लेकिन बच्चों के ब्लॉगों को प्रस्तुत करने में इस पुस्तक में बहुत कृपणता बरती गई है। उल्लेखनीय है कि नियमितरूप से सक्रिय बच्चों के बहुत से ब्लॉगों - चैतन्य का कोना, स्पर्श, पंखुरी टाइम्स, पार्थवी, रुद्र, लाडली, लविजा, गोलू गाए बुलबुल नाचे, लेखिका, बालवृन्द, चुन-चुन गाती चिड़िया, फुलबगिया, मन के रंग, बाल सभा, मानसी की दुनिया, नन्हे पंख, अनुष्का, बच्चों की दुनिया, स्वप्निल संसार, टाबरटोली आदि का तो इसमें जिक्र तक नहीं है।
इसकी क्रम में सन् 2003 से 2011 तक रिकार्ड पोस्ट लगाने वाले किसी भी ब्लॉग की ओर विद्वान लेखक का ध्यान हीं गया है। इसके बाद यदि बात करें ब्लॉगर मीट या ब्लॉगर सम्मेलन की तो इस पर भी कोई विशेष प्रकाश इस पुस्तक में नहीं डाला गया है।
आलोक कुमार जी के नौ दो ग्यारह से लेकर 2010 तक के चिट्ठों को सम्मिलित करके, एक पुस्तक का रूप देना अपने आप में एक महत्वपूर्ण कार्य था जिसे श्री रवीन्द्र प्रभात जी ने पूरा कर दिखाया है। इसके लिए वे धन्यवाद के पात्र हैं।
इस सम्बन्ध में इतना ही कहना चाहूँगा कि लेखक सर्वव्यापी या सर्वशक्तिमान नहीं होता है, इसलिए सभी बिन्दुओं पर चर्चा करना सम्भव नहीं हो पाता है। वर्तमान कल का इतिहास होता है और इसको जिस प्रकार से हिन्दी ब्लॉगिंग का इतिहास में प्रस्तुत किया गया है वह एक सराहनीय प्रयास है। मैं समझता हूँ की हिन्दी ब्लॉगिंग का इतिहास हिन्दी ब्लॉगरों के लिए एक धरोहर से कम नहीं है। जिसको सभी ब्लॉगरों पास होना चाहिए।

11 June, 2011

"ताजमहल की वास्तविकता" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


‘‘अगर बुरा लगे तो क्षमा करना’’

हमारे विद्यालयों ओर विश्वविद्यालयों में 
पढ़ाया जा रहा है कि ताजमहल एक कब्र है। 
बादशाह शाहजहाँ ने अपनी बेगम 
मुमताजमहल की याद में यह कब्र बनाई गयी थी।
इसे बनवाने के लिए कितने मजदूर, 
कितने वर्ष काम करते रहे?
नक्शा किसने बनाया था?
भवन कब बनकर तैयार हुआ?
उस पर कितनी लागत आई थी?
यह आज सब कुछ तैयार कर दिया गया है।
कौन पूछे कि बनाने वाले को तो उसी के बेटे ने 
जेल में डाल दिया था। उसकी हालत 
आर्थिकरूप से क्या थी? कि-
जिन्दा बाप ऐ-आबतरसानी। 
ऐ बेटे! तू अजब मुसलमान है कि जिन्दा बाप को 
पानी की बून्द-बून्द के लिए तड़पा रहा है। 
तुझसे तो हिन्दू मूर्ति-पूजक बेहतर हैं 
जो श्राद्ध के नाम पर मरने के बाद भी 
माँ-बाप को भोजन भेज रहे हैं। 
किसी ने यह तो पूछना नही है कि 
उस जेल में पड़े लाचार बादशाह के पास 
इतना धन था भी या नही कि जो ताज बनवा सकता।
इतिहासकार ने लिखा है कि 
ताज के गिर्द पैड बनवाने में ही खजाना खाली हो गया था।
 हम पाठकों से यह निवेदन करेंगे कि 
यदि उन्हें कुछ अवसर मिले तो 
एक बार ताजमहल अवश्य देखें।
१ - ताजमहल के अन्दर प्रवेश करने से पहले 
मुख्यद्वार तक पहुँचने के लिए 
जो चाहर-दीवारी बनी है, 
उसमें सकड़ों छोटे बड़े कमरे बने हैं।
गाइड बतायेगा कि इनमें बादशाह के घोड़े बँधते थे, 
घुड़सवार यहाँ ठहरते थे।
हाँ! आप किसी गाइड से यह मत पूछ लेना कि 
कब्रिस्तान में घुड़सवार क्यों रहते थे? 
क्या मुरदे रात को उठ कर भाग जाते थे, 
जिन्हें रोकना जरूरी था? 
या, 
जीवित मुर्दे रहते थे, 
जिनकी रक्षा और सेवा के लिए घुड़सवार चाहिए थे?
२ - यहाँ प्रविष्ट होते ही एक कुआँ है 
जो पहले यन्त्रों के द्वारा चलाया जाता था। 
उस कुएँ की कई परतें हैं। 
सारा कुआँ यन्त्र से खाली किया जा सकता था। 
यदि जरूरत हो तो उसमें से पीछे बहने वाली 
यमुना नदी में सुरक्षित पहुँचा जा सकता था। 
निचले तल में कोई भी सामान सुरक्षित करके 
रखा जा सकता था और साथ ही 
ऊपर के तल को यमुना के पानी से
 इस प्रकार भरा जा सकता था कि 
नीचे की तह का किसी को पता भी चले 
और सामान भी सुरक्षित रह जाये।
(क्या यह विलक्षण कलायुक्त कूप 
इस स्थान को मुर्दो की बस्ती की 
जरूरत की चीज बता सकता है।)
३ - आगे खुले मैदान में दो कब्रें बनी हैं। 
इतिहास साक्षी है कि मुमताज आगरा में नही मरी थी। 
वह तो खण्डवा के पास बुरहानपुर में
 १० -१२ वर्ष पहले मरी थी और वहीं दफनाई गयी थी। 
आज भी वहीं उसकी कब्र बनी है।
परन्तु गाइउ आपको बतायेगा कि बुरहानपुर से 
कब्र में से निकाल कर लाश १२ वर्ष बाद 
खोद कर लाई लाई गयी और यहीं आगरा में 
सुरक्षित इस स्थान पर कब्र में नीचे रख दी गयी। 
जब ताज का निर्माण पूरा हो गया तो 
वहाँ से फिर खोद कर निकाली गई 
और उसे ताज भवन में दफना दिया गया। 
उस ऊँचे गुम्बद के नीचे जहाँ पटल लगा है, 
मलिका मुमताज महल नीचे की कब्र में 
हमेशा की नींद सो रही है।
परन्तु आप हैरान होंगे कि 
जहाँ असली कब्र बताई जाती है 
वह स्थान तो भूमि ही नही है। 
वह ताज भवन के दुमंजिले की छत है। 
पीछे बहने वाली यमुना नदी 
उससे २० - २५ फीट नीचे 
ताज की दीवार के साथ सट कर बह रही है। 
यानि कब्र के नाम पर दुनिया की आँखों में 
धूल झोंक दी गयी है। 
कब्रें छतों पर नही भूमि पर बनतीं हैं।

४ - उसके पीछे की दीवार में 
(यमुना में खड़े होकर देखने पर साफ दिखाई देता है 
कि दीवार में बहुत सारी खिड़कियाँ बनी हैं, 
जिन्हें पत्थर-मिट्टी से भरकर बन्द करने की 
कोशिश की गई है। 
परन्तु वे अधखुली खिड़कियाँ चुगली कर रही हैं।) 
अन्दर ताज की कब्र की सीढ़ी के सामने भी 
एक दरवाजा है। उसे ताला लगा कर 
बन्द किया गया है, जिस पर पटल लगा है-
सरकारी आदेश से अमुक सन् में 
यह द्वार बन्द किया गया है।
यदि आप यह दरवाजा खुलवा कर 
कभी अन्दर झाँक सकें तो वहाँ 
पुरानी टूटी मूतियाँ और मन्दिर के
 खण्डहर मिल जायेंगे। 
वहाँ उस मंजिल में पचासों कमरे हैं 
जिनकी खिड़कियाँ जमुना जी की तरफ खुलती हैं।
इस पर हमसे कहा जाता है कि 
इस बात पर विश्वास कर लो कि यह कब्रिस्तान है। 
ये कमरे क्या मुरदों के निवास के लिए बनाये गये थे?
५ - भवन के सामने भूमि पर ताज का 
मानचित्र बनाया गया है। 
जो भारतीय वास्तुकला के नियमानुसार है।
ताज शिखर पर जो मंगलघट बना है। 
उस घट के मुख पर नारिकेल और 
आम्रपत्रिकाएँ बनाई गयी हैं 
और त्रिशूल चमक रहा है। 
वही सब कुछ मानचित्र में भी बना है।
इतने सारे प्रमाण होते हुए भी 
अंग्रेज लोग २०० साल तक हमें यह पढ़ाते रहे 
कि यह मुस्लिम संरचना है।
आजादी के साठ से अधिक वर्ष बीत जाने पर भी 
आज तक हमारे कालिजों में 
इतिहास की खोजो के नाम पर 
वही पढ़ाया जा रहा है जो कि अंग्रेज हमें पढ़ाते थे।
(अमृतपथ, देहरादून जुलाई ,२००९ से साभार)

10 April, 2011

ब्लॉगर मीट का निमन्त्रण-FIND RAJASTHAN


जो ब्लॉगर 30 अप्रैल को दिल्ली पधार रहे हैं।

उनसे निवेदन है कि रानी जिला पाली राजस्थान मैं दिनांक 1 व 2 मई को आयोजित होने वाले 
ब्लॉगर मीट में भी भाग लेने के लिए 
अपना अमूल्य समय जरूर निकालें!

आप सभी आमंत्रित हैं
रानी जिला पाली राजस्थान मैं दिनांक 1 व 2 मई को आयोजित होने वाले ब्लॉगर मीट में जिसका नाम है FIND RAJASTHAN

इसमें प्रथम दिवस में आने के बाद आराम विश्राम के पश्चात परिचय सत्र का आयोजन किया जायेगा, इसके पश्चात रात्रि के समय एक गोष्ठी होगी जिसमे कुछ ज्वलंत मुद्दों पर आप सभी ब्लागरों से चर्चा की जायेगी

दुसरे दिन नजदीकी भ्रमण स्थान रणकपुर जैन मंदिर जो की विश्व प्रशिद्ध है का भ्रमण किया जायेगा .
नजदीकी रेलवे स्टेशन रानी और फालना है जयपुर दिल्ली और मुंबई तक से सीधी ट्रेन सुविधा है साथ ही बिहार और उत्तर प्रदेश से भी कई ट्रेने चलती है
आप केवल अपना स्थान बता दीजिये पूर्ण ट्रेन की समय सारणी भिजवा दी जाएगी

कृपया कर आने वाले ब्लॉगर अपना नाम दिनांक 25 अप्रेल तक दे देवें ताकि कार्यक्रम की रुपरेखा प्रकाशित हो सके
संपर्क करें bloggermeet@naradnetwork.in
tarun@naradnetwork.in
Mobile No. 9251610562

JAI HIND

सत्यार्थ प्रकाशः प्रथम समुल्लास अंक-9


सत्यार्थ प्रकाशः प्रथम समुल्लास अंक-9



क्रमशः अगले अंक में---

01 April, 2011

सत्यार्थ प्रकाशः प्रथम समुल्लास अंक-8


सत्यार्थ प्रकाशः प्रथम समुल्लास अंक-8


क्रमशः अगले अंक में---

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