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05 October, 2013

"ऊर्जा मिलने लगी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत
"ऊर्जा मिलने लगी है"
कायदे से धूप अब खिलने लगी है।
लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।।

दे रहा मधुमास दस्तक, शीत भी जाने लगा,
भ्रमर उपवन में मधुर संगीत भी गाने लगा,
चटककर कलियाँ सभी खिलने लगी हैं।
लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।।

कल तलक कुहरा घना था, आज बादल छा गये,
सींचने आँचल धरा का, धुंध धोने आ गये,
पादपों पर हरितिमा खिलने लगी है।
लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।।

सब पुरातन पात पेड़ों से, स्वयं झड़ने लगे हैं,
बीनकर तिनके परिन्दे, नीड़ को गढ़ने लगे हैं,
अब मुहब्बत चाके-दिल सिलने लगी है।
लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।। 

5 comments:

  1. नवरात्रि की शुभकामनायें गुरुवर -
    सुन्दर प्रस्तुति-

    ReplyDelete
  2. सुन्दर प्रस्तुति
    सुरेश राय
    कभी यहाँ भी पधारें और टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें
    http://mankamirror.blogspot.in

    ReplyDelete
  3. बहुत सुंदर,नवरात्रि की शुभकामनायें गुरुवर.

    ReplyDelete
  4. पात सारे धनुष बन इंद्र का ,

    मीत देखो हौसले झड़ने चले हैं।

    बहुत सुन्दर रचना -

    कायदे से धूप अब खिलने लगी है।
    लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।।

    लेखनी को ऊर्जा अब,

    नित नै मिलने लगी है।

    ReplyDelete

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