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25 January, 2014

"चलना ही है जीवन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
 
चलना ही है जीवन
जीवन पथ पर, आगे बढ़ते रहो हमेशा,
साहस से टल जायेंगी सारी ही उलझन।
नदी और तालाब, यही देते हैं सन्देशा,
रुकना तो सड़ना है, चलना ही है जीवन।।

पोथी पढ़ने से  जन पण्डित कहलाता है,
बून्द-बून्द मिलकर ही सागर बन जाता है,
प्यार रोपने से ही आता है अपनापन।
रुकना तो सड़ना है, चलना ही है जीवन।।

सर्दी,गर्मी, धरा हमेशा सहती है,
अपना दुखड़ा नही किसी से कहती है,
इसकी ही गोदी में पलते हैं वन कानन।
रुकना तो सड़ना है, चलना ही है जीवन।।

शीतल-मन्द-सुगऩ्ध बयारें चलकर आतीं,
नभ से चल कर मस्त फुहारें जल बरसातीं,
चलने से ही स्वस्थ हमेशा रहता तन-मन।
रुकना तो सड़ना है, चलना ही है जीवन।।

4 comments:

  1. मित्रवर!गणतन्त्र-दिवस की ह्रदय से लाखों वधाइयां !
    रचना अच्छी है !
    कुछ अच्छे सूत्रों के लिये साधुवाद !

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  2. चलते ही जाना। गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई।

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  3. सुन्दर प्रस्तुति …………भ्रष्टाचार मिटाना चाहते हो तो पहले खुद को बदलो
    अपने धर्म ईमान की इक कसम लो
    रिश्वत ना देने ना लेने की इक पहल करो
    सारे जहान में छवि फिर बदल जायेगी
    हिन्दुस्तान की तकदीर निखर जायेगी
    किस्मत तुम्हारी भी संवर जायेगी
    हर थाली में रोटी नज़र आएगी
    हर मकान पर इक छत नज़र आएगी
    बस इक पहल तुम स्वयं से करके तो देखो
    जब हर चेहरे पर खुशियों का कँवल खिल जाएगा
    हर आँगन सुरक्षित जब नज़र आएगा
    बेटियों बहनों का सम्मान जब सुरक्षित हो जायेगा
    फिर गणतंत्र दिवस वास्तव में मन जाएगा

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