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27 December, 2013

"मखमली लिबास" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
 
एक गीत
"मखमली लिबास
मखमली लिबास आज तार-तार हो गया! 
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!  

सभ्यताएँ मर गईं हैं, आदमी के देश में, 
क्रूरताएँ बढ़ गईं हैं, आदमी के वेश में, 
मौत की फसल उगी हैं, जीना भार हो गया! 
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!  

भोले पंछियों के पंख, नोच रहा बाज है, 
गुम हुए अतीत को ही, खोज रहा आज है,  
शान्ति का कपोत बाज का शिकार हो गया! 
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!  

पर्वतों से बहने वाली धार, मैली हो गईं, 
महक देने वाली गन्ध भी, विषैली हो गई, 
जिस सुमन पे आस टिकी, वो ही खार हो गया! 
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!

6 comments:

  1. bahut sundar prastuti, hardik abhaar.
    kuch din pakle maine ek kavita likha tha, apki kavita padhkar apni kavita yaad gayi, link neeche likh rha hu....

    वंदे मातरम्: प्रतिघात

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (28-12-2013) "जिन पे असर नहीं होता" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1475 पर होगी.
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
    सादर...!

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  3. बहुत सटीक रचना

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  4. बहुत ही सटीक रचना ....

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