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26 November, 2013

"हाथ जलने लगे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
एक गीत
"हाथ जलने लगे"
करते-करते भजन, स्वार्थ छलने लगे। 
करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।।  

झूमती घाटियों में, हवा बे-रहम, 
घूमती वादियों में, हया  बे-शरम, 
शीत में है तपन, हिम पिघलने लगे। 
करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।।  

उम्र भर जख्म पर जख्म खाते रहे, 
फूल गुलशन में हरदम खिलाते रहे, 
गुल ने ओढ़ी चुभन, घाव पलने लगे। 
करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।।  

हो रहा हर जगह, धन से धन का मिलन, 
रो रहा हर जगह, भाई-चारा अमन,  
नाम है आचमन, जाम ढलने लगे।  
करते-करते यजन, हाथ जलने लगे।।

3 comments:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  2. क्या मुर्गा अंडा देता हे जरा इसे देखें ..
    http://chirkutpapu.blogspot.in/2013/11/murgi-jokes-kal-se-sbko-do-do-ande-dene.html

    ReplyDelete

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