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15 November, 2013

"बादल आये रे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
एक गीत
"बादल आये रे"
जिसको अपना मधुर स्वर दिया है
अर्चना चाव जी ने...!
चौमासे में आसमान में,
घिर-घिर बादल आये रे!
श्याम-घटाएँ विरहनिया के,
मन में आग लगाए रे!!

उनके लिए सुखद चौमासा,
पास बसे जिनके प्रियतम,
कुण्ठित है उनकी अभिलाषा,
दूर बसे जिनके साजन ,
वैरिन बदली खारे जल को,
नयनों से बरसाए रे!
श्याम-घटाएँ विरहनिया के,
मन में आग लगाए रे!!

पुरवा की जब पड़ीं फुहारें,
ताप धरा का बहुत बढ़ा,
मस्त हवाओं के आने से ,
मन का पारा बहुत चढ़ा,
नील-गगन के इन्द्रधनुष भी,
मन को नहीं सुहाए रे!
श्याम-घटाएँ विरहनिया के,
मन में आग लगाए रे!!

जिनके घर पक्के-पक्के हैं,
बारिश उनका ताप हरे,
जिनके घर कच्चे-कच्चे हैं,
उनके आँगन पंक भरे,
कंगाली में आटा गीला,
हर-पल भूख सताए रे!
श्याम-घटाएँ विरहनिया के,
मन में आग लगाए रे!!

3 comments:

  1. Nice post computer and internet ke nayi jankaari tips trick and tech news ke liye click kare www.hinditechtrick.blogspot.com

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  2. सुन्दर भावपूर्ण प्रतुती

    ReplyDelete
  3. चौमासे में आसमान में,
    घिर-घिर बादल आये रे!
    श्याम-घटाएँ विरहनिया के,
    मन में आग लगाए रे!!

    बे हद की सांगीतिक रचना मीठी मीठी रोटी सी ।

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