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21 March, 2011

"सत्यार्थ प्रकाश की भूमिका"

मित्रों!

लगभग 50 वर्ष पूर्व मैं गुरूकुल महाविद्यालय, ज्वालापुर (हरिद्वार) में पढ़ने के लिए गया था मेरा वेदारम्भ-संस्कार सन् 1960 में हआ था। तभी मुझे प्रतिदिन अनुशीलन करने के लिए मेरे मामा जी स्व.रामचन्द्र आर्य ने मुझे बड़े अक्षरों वाला सत्यार्थ-प्रकाश दिलवाया था। आज भी मेरे पास यह सुरक्षित है।
नेट पर कई ब्लॉगरों ने सत्यार्थ प्रकाश पढ़ने की जिज्ञासा व्यक्त की थी। 
मैं आज से सत्यार्थ-प्रकाश की शृंखला शुरू कर रहा हूँ! 
क्रमशः मैं इसका एक बहुत छोटा अंश प्रकाशित किया करूँगा। लेकिन आज इसकी भूमिका पूरी ही प्रकाशित कर रहा हूँ!
     ब़ड़ा करके पढ़ने के लिए इन छवियों को क्लिक कीजिए!







4 comments:

  1. ये तो अच्छा काम कर रहे है आप मगर थोडा थोडा ही लगाइये ताकि पढने मे रोचकता बनी रहे।

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  2. आपका यह संकल्प लाखों लोगों के लिए
    मंगलकारी सिद्ध होगा।
    ========================
    महकती रहे नित्य-संकल्प-धारा।
    जिसे आपने है हृदय में उतारा॥
    ========================
    होली मुबारक़ हो। सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

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  3. कुछ लोग जीते जी इतिहास रच जाते हैं
    कुछ लोग मर कर इतिहास बनाते हैं
    और कुछ लोग जीते जी मार दिये जाते हैं
    फिर इतिहास खुद उनसे बनता हैं
    आशा है की आगे भी मुझे असे ही नई पोस्ट पढने को मिलेंगी
    आपका ब्लॉग पसंद आया...इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को मिलेंगी

    कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-



    बहुत मार्मिक रचना..बहुत सुन्दर...होली की हार्दिक शुभकामनायें!

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  4. der se aaya hun ..aaj se suru kiya hai padhna ....shukria ise padhne ka avsar mila

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