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09 April, 2014

"अरमानों की डोली" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत
"अरमानों की डोली"
 अरमानों की डोली आई, जब से मेरे गाँव में।
पवनबसन्ती चलकर आई, गाँव-गली हर ठाँव में।। 
बने हकीकत, स्वप्न सिन्दूरी, चहका है घर-आँगन भी,
पूर्ण हो गई आस अधूरी, महका मन का उपवन भी,
कोयल गाती राग मधुर, पेड़ों की ठण्डी छाँव में।
पवनबसन्ती चलकर आई, गाँव-गली हर ठाँव में।।  
खनक रहीं हाथों में चुड़ियाँ, कंगन भरते किलकारी,
चूम रहा माथे को टीका, लटक रहे झूमर भारी,
छनक-छनक बजतीं पैजनियाँ, ठुमक-ठुमक कर पाँव में।
पवनबसन्ती चलकर आई, गाँव-गली हर ठाँव में।।   
भाभी-भाभी कहकर बहना, फूली नहीं समाती है,
नयी नवेली नया शब्द सुन, पुलकित हो हर्षाती है,
 सागर से भर लाया माणिक, नाविक अपनी नाव में।
पवनबसन्ती चलकर आई, गाँव-गली हर ठाँव में।। 

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