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24 March, 2014

"बढ़े चलो-बढ़े चलो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्यसंग्रह "धरा के रंग" से
एक गीत
♥बढ़े चलो-बढ़े चलो

कारवाँ गुजर रहा , रास्तों को नापकर।
मंजिलें बुला रहींबढ़े चलो-बढ़े चलो!
है कठिन बहुत डगरचलना देख-भालकर,
धूप चिलचिला रहीबढ़े चलो-बढ़े चलो!!

दलदलों में धँस न जाना, रास्ते सपाट हैं
ज़लज़लों में फँस न जाना, आँधियाँ विराट हैं,
रेत के समन्दरों कोकुशलता से पार कर,
धूप चिलचिला रहीबढ़े चलो-बढ़े चलो!!

मृगमरीचिका में, दूर-दूर तक सलिल नही,
ताप है समीर में, सुलभ-सुखद अनिल नहीं,
तन भरा है स्वेद से, देह चिपचिपा रही,
धूप चिलचिला रहीबढ़े चलो-बढ़े चलो!!

कट गया अधिक सफर, बस जरा सा शेष है,
किन्तु जो बचा हुआ, वही तो कुछ विशेष है,
दीप झिलमिला रहे, पाँव डगमगा रहे,
धूप चिलचिला रहीबढ़े चलो-बढ़े चलो!!

5 comments:

  1. bahut sundar urjwasit karta hua geet , hardik badhai

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  2. कट गया अधिक सफर, बस जरा सा शेष है,
    किन्तु जो बचा हुआ, वही तो कुछ विशेष है,
    दीप झिलमिला रहे, पाँव डगमगा रहे,
    धूप चिलचिला रही, बढ़े चलो-बढ़े चलो!!waah kya bat hai .....sare jiwan ka saransh likh diya ......

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  3. बहुत सुन्दर उत्कृष्ट गीत आदरणीय

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  4. मन में जोश-जज़्बा पैदा करती हुई लाज़वाब प्रस्तुति

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  5. सुन्दर आह्वान ... उमंगे भरती ...

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