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05 October, 2012

"श्रद्धापूर्वक श्राद्ध किया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बात अन्धश्रद्धा की नहीं है!

   मेरे पूज्य दादा-दादी जी का श्राद्ध पितृपक्ष की षष्टी को पड़ता है। गत वर्ष मैं पंचमी की शाम को देहरी लीप कर उन्हें आमन्त्रित करना भूल गया था। अगले दिन षष्टी थी। विधि-विधान से हमने श्राद्ध किया और उनके हिस्से का भाग दो पत्तलों में रखकर छत की मुंडेर पर रख दिया मगर शाम तक वो भोजन ज्यों का त्यों रखा रहा। एक भी कौआ उन्हें खाने के लिए नहीं आया। मन में पछतावा भी बहुत रहा। 
    लेकिन इस वर्ष हमने वो भूल नहीं की। पंचमी की शाम को देहरी लीप कर पितरों को आमन्त्रित किया कि कल आपका श्राद्ध है। आप अपने हिस्से का भोजन ग्रहण करने अवश्य आयें।
आज षष्टी के दिन हमने विधि-विधान से अपने पूज्य दादा-दादी जी का श्राद्ध किया।
   जैसे ही उनके हिस्से का भोजन पत्तलों में छत की मुंडेर पर रखा, उसको खाने के लिए कागा आ गये।
    कुछ मेरे आर्यसमाजी मित्र इस बात का उपहास भी करते होंगे। मगर मुझे इस बात की परवाह नहीं है। हम लोग जब हवन करते हैं तो प्रचण्ड अग्नि में यज्ञकुंड में घी-हवनसामग्री और पौष्टिक पदार्थ डालते हैं। जिसका सहस्त्रगुना होकर वह पदार्थ पूरे वातावरण में अपनी गन्ध से सारे लोगों को मिल जाता है। आज भी तो हमने वही किया है। हवनकुण्ड में प्रज्वलित अग्नि में भोजन घी और हवनसामग्री की आहुति दी है। जो अन्तरिक्ष में जाकर सभी लोगों को प्राप्त भी हुई है।
    आर्यसमाज ईश्वर, जीव और प्रकृति को अजर और अमर मानता है। फिर जीवात्मा के अस्तित्व को कैसे नकारा जा सकता है। श्राद्ध का अर्थ होता है श्रद्धापूर्वक जीवित के साथ ब्रह्माण्ड में विचरण कर रही जीवात्माओं को भोजन कराना। हमने भी पूरी आस्था और श्रद्धा से वही कार्य आज भी किया है।
   इसके बाद अपने वृद्ध माता-पिता जी को पूरी श्रद्धा से भोजन कराया ताथा उसके बाद खुद भी इस भोजन को खाया है।

7 comments:

  1. श्रद्धा का श्राद्ध पितृपक्ष में ...
    सादर नमन

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  2. श्रद्धा सह विश्वास की, सदा जरुरत घोर |
    आस्था का यदि मामला, नहीं तर्क का जोर |
    नहीं तर्क का जोर, पूर्वज याद कीजिये |
    चलो सदा सन्मार्ग, नियम से श्राद्ध कीजिये |
    पित्तर कोटि प्रणाम, मिले आशीष तुम्हारा |
    पूर्ण होय हर काम, जगत में हो उजियारा ||

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  3. शास्त्री जी ,
    आप ही नहीं हमारे ख्याल से ये बात सत्य है कि पितरों को अपने वंशजों से कुछ अपेक्षा होती है और उनकी तृप्ति और अतृप्ति से हमारे जीवन पर भी प्रभाव पड़ता है. मेरा अपना अनुभव है - श्राद्ध के दिनों में हमारे ससुर जी तो तर्पण वगैरह करते थे और गंगा किनारे जाकर पंडितों को भोजन करते थे . मेरी सासु को इसमें विश्वास न था. जब मेरी शादी हुई और पहले पितृ पक्ष में ही मुझे स्वप्न में एक महिला ने आकर खाना माँगा . मैं न जानती थी क्योंकि वो मेरे ससुर की माताजी थी और उनके बचपन में ही सवार्ग्वासी हो चुकी थी. मैंने अपना सपना बताया और जब उनकी रूपरेखा बताई तो ससुर जी ने कहा ऐसी मेरी माताजी थी और फिर उन्होंने कागजों से एक फोटो निकल कर मुझे दिखाई और वह हूबहू वही महिला थीं. तब से मैं इस बात पर पूरा विश्वास करती हूँ.

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  4. हमारी परम्पराएँ भी मन को शांति प्रदान करती हैं .

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  5. श्रध्हा से जो हम अपने पूर्वजों के लिए करते हैं ,हवन ब्रम्ह-भोज आदि वह हमें एक अंदरूनी संतोष से भर देता है ,अपना विश्वास अपनी जगह

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  6. श्राद्ध के बहाने पूर्वज याद आ जाते हैं
    साल के कुछ दिन उन्हे हम बुलाते हैं
    श्रद्धा से पुकारा गया हो अगर
    किसी ना किसी रूप में जरूर आते हैं !

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  7. ये हमारी आस्थाएं और अपने पितरो के प्रति श्रद्धा भाव है जिसे श्राद्ध कहते हैं...
    मनुष्य योनि त्रिगुणात्मक है और इसमें जो गुण हो,उसके अनुसार ही उसका कर्म और स्वभाव निर्मित होता है। जिन मनुष्यों में सत्वगुण की प्रधानता रहती है--वे अपने आराध्य के प्रति श्रद्धा भाव रखते हुए,धर्म का आश्रय लिए जीवनपथ पर बढते चले जाते हैं। रजोगुण प्रधान मनुष्य भूत-प्रेत,पीरों-फकीरों के चक्कर उलझा रहता है और तमोगुणी व्यक्ति को तो भौतिक सुखों के अतिरिक्त कुछ ओर दिखाई ही नहीं देता। नास्तिक भाव का प्रादुर्भाव सिर्फ तमोगुणी व्यक्ति में ही होता है।.............
    सादर प्रणाम एवं अभिनन्दन शास्त्री जी ....

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