समर्थक

29 October, 2013

"गीत गाना जानते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से

एक गीत
"गीत गाना जानते हैं"

वेदना के नीड़ को पहचानते हैं।
हम विरह में गीत गाना जानते हैं।।

दुःख से नाता बहुत गहरा रहा,
मीत इनको हम स्वयं का मानते हैं।
हम विरह में गीत गाना जानते हैं।।

हर उजाले से अन्धेरा है बंधा,
खाक दर-दर की नहीं हम छानते हैं।
हम विरह में गीत गाना जानते हैं।।

शूल के ही साथ रहते फूल हैं,
बैर काँटों से नहीं हम ठानते हैं।
हम विरह में गीत गाना जानते हैं।।

25 October, 2013

"ढूँढने निकला हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह "धरा के रंग" से एक गीत
"ढूँढ़ने निकला हूँ"
ईमान ढूँढने निकला हूँ, मैं मक्कारों की झोली में। 
बलवान ढूँढने निकला हूँ, मैं मुर्दारों की टोली में। 
ताल ठोंकता काल घूमता, बस्ती और चौराहों पर
 
कुछ प्राण ढूँढने निकला हूँ, मैं गद्दारों की गोली में।  
आग लगाई अपने घर में, दीपक और चिरागों ने
सामान ढूँढने निकला हूँ, मैं अंगारों की होली में। 
निर्धन नहीं रहेगा कोई, खबर छपी अख़बारों में
अनुदान ढूँढने निकला हूँ, मैं सरकारों की बोली में। 
सरकण्डे से बने झोंपड़े, निशि-दिन लोहा कूट रहे,  
आराम ढूँढने निकला हूँ, मैं बंजारों की खोली में। 
यौवन घूम रहा बे-ग़ैरत, हया-शर्म का नाम नहीं
मुस्कान ढूँढने निकला हूँ, मैं बाजारों की चोली में।
बोतल-साक़ी और सुरा है, सजी हुई महफिल भी है,
सुखधाम ढूँढने निकला हूँ, मैं मधुशाला की डोली में।
विकृतरूप हुआ लीला का, राम-लखन हैं व्यभिचारी,
भगवान ढूँढने निकला हूँ, मैं कलयुग की रंगोली में।

21 October, 2013

"सिमट रही खेती सारी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत

"सिमट रही खेती सारी"
सब्जी, चावल और गेँहू की, सिमट रही खेती सारी। 
शस्यश्यामला धरती पर, उग रहे भवन भारी-भारी।। 

बाग आम के-पेड़ नीम के आँगन से  कटते जाते हैं, 
जीवन देने वाले वन भी, दिन-प्रतिदिन घटते जाते है, 
लगी फूलने आज वतन में, अस्त्र-शस्त्र की फुलवारी। 
शस्यश्यामला धरती पर, उग रहे भवन भारी-भारी।। 

आधुनिक कहलाने को,  पथ अपनाया हमने विनाश का, 
अपनाकर पश्चिमीसभ्यता  नाम दिया हमने विकास का, 
अपनी सरल-शान्त बगिया में सुलगा दी है चिंगारी। 
शस्यश्यामला धरती पर, उग रहे भवन भारी-भारी।। 

दूध-दही की दाता गइया, बिना घास के भूखी मरती, 
कूड़ा खाने वाली मुर्गी, पुष्टाहार मजे से चरती, 
सुख के सूरज की आशाएँ तकती कुटिया बेचारी। 
शस्यश्यामला धरती पर, उग रहे भवन भारी-भारी।। 

बालक तरसे मूँगफली को,  बिल्ले खाते हैं हलवा, 
सत्ता की कुर्सी हथियाकर, काजू खाता है कलवा, 
निर्धन कृषक कमाता माटी, दाम कमाता व्यापारी। 
शस्यश्यामला धरती पर, उग रहे भवन भारी-भारी।। 

मुख में राम बगल में चाकू, कर डाला बरबाद सुमन, 
आचारों की सीख दे रहा, अनाचार का अब उपवन, 
गरलपान करना ही अब तो जन-जन की है लाचारी। 
शस्यश्यामला धरती पर, उग रहे भवन भारी-भारी।।

17 October, 2013

"प्यार से बाँट रहा हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत


"प्यार से बाँट रहा हूँ"

रुई पुरानी मुझे मिली है, मोटा-झोटा कात रहा हूँ।
मेरी झोली में जो कुछ है, वही प्यार से बाँट रहा हूँ।।

खोटे सिक्के जमा किये थे, 
मीत अजनबी बना लिए थे,
सम्बन्धों की खाई को मैं, खुर्पी लेकर पाट रहा हूँ।
मेरी झोली में जो कुछ है, वही प्यार से बाँट रहा हूँ।।

सुख का सूरज नजर न आता,
दुख का बादल हाड़ कँपाता,
नभ पर जमे हुए कुहरे को, दीप जलाकर छाँट रहा हूँ।
मेरी झोली में जो कुछ है, वही प्यार से बाँट रहा हूँ।।

आशाएँ हो गयी क्षीण हैं,
सरिताएँ जल से विहीन हैं,
प्यास बुझाने को मैं अपनी, तुहिन कणों को चाट रहा हूँ ।
मेरी झोली में जो कुछ है, वही प्यार से बाँट रहा हूँ।।

कैसे मैं वाटिका सजाऊँ,
नूतन बिम्ब कहाँ से लाऊँ,
जो कुछ बोया था खेतों में, उसको ही मैं काट रहा हूँ।
मेरी झोली में जो कुछ है, वही प्यार से बाँट रहा हूँ।।

13 October, 2013

"बरखा हमें बुलाती है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत
\"बरखा हमें बुलाती है"

--
 
बरस रहे हैं रिम-झिम मेघा, पुरवइया गाती है।
आओ भीगें साथ-साथ हम, बरखा हमें बुलाती है।।

छम-छम पड़ती बारिश में, हम धोएँ मन के मैल सभी,
सदा प्यार से रहने की, हम सौगन्धें लें आज-अभी,
प्रेम-प्रीत का पानी पीकर, ही हरियाली आती है।
आओ भीगें साथ-साथ हम, बरखा हमें बुलाती है।।

धन-दौलत से नहीं कभी भी, प्यार खरीदा जाता है,
जिसमें कोमल भाव भरे हो, पास उन्हीं के आता है,
है अनमोल देन ईश्वर की, यह नैसर्गिक थाती है।
आओ भीगें साथ-साथ हम, बरखा हमें बुलाती है।।

फूल और काँटे जीवन भर, संग-संग ही रहते हैं,
आपस में दोनों मिल-जुलकर, अपना सुख-दुख कहते हैं,
इनकी जीवन कथा, प्रेम की सीख हमें सिखलाती है।
आओ भीगें साथ-साथ हम, बरखा हमें बुलाती है।।

09 October, 2013

"लेकर आऊँगा उजियारा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत
"लेकर आऊँगा उजियारा"
मैं नये साल का सूरज हूँ,
हरने आया हूँ अँधियारा।
 मैं स्वर्णरश्मियों से अपनी,
लेकर आऊँगा उजियारा।।

चन्दा को दूँगा मैं प्रकाश,
सुमनों को दूँगा मैं सुवास,
मैं रोज गगन में चमकूँगा,
मैं सदा रहूँगा आस-पास,
मैं जीवन का संवाहक हूँ,
कर दूँगा रौशन जग सारा।
लेकर आऊँगा उजियारा।।

मैं नित्य-नियम से चलता हूँ,
प्रतिदिन उगता और ढलता हूँ,
निद्रा से तुम्हें जगाने को,
पूरब से रोज निकलता हूँ,
नित नई ऊर्जा भर  दूँगा,
चमकेगा किस्मत का तारा।
लेकर आऊँगा उजियारा।।

मैं दिन का भेद बताता हूँ,
और रातों को छिप जाता हूँ,
विश्राम करो श्रम को करके,
मैं पाठ यही सिखलाता हूँ,
बन जाऊँगा मैं सरदी में,
गुनगुनी धूप का अंगारा।
लेकर आऊँगा उजियारा।।

मैं नये साल का सूरज हूँ,
हरने आया हूँ अँधियारा।।

05 October, 2013

"ऊर्जा मिलने लगी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत
"ऊर्जा मिलने लगी है"
कायदे से धूप अब खिलने लगी है।
लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।।

दे रहा मधुमास दस्तक, शीत भी जाने लगा,
भ्रमर उपवन में मधुर संगीत भी गाने लगा,
चटककर कलियाँ सभी खिलने लगी हैं।
लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।।

कल तलक कुहरा घना था, आज बादल छा गये,
सींचने आँचल धरा का, धुंध धोने आ गये,
पादपों पर हरितिमा खिलने लगी है।
लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।।

सब पुरातन पात पेड़ों से, स्वयं झड़ने लगे हैं,
बीनकर तिनके परिन्दे, नीड़ को गढ़ने लगे हैं,
अब मुहब्बत चाके-दिल सिलने लगी है।
लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।। 

01 October, 2013

"मुस्काया बसन्त" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत
"मुस्काया बसन्त"
बीता पतझड़ आया बसन्त।
मधुबन में मुस्काया बसन्त।।
 पेड़ों ने पाये नये वस्त्र,
पौधों ने किया सिंगार नवल,
गेहूँ के बिरुवे झूम रहे,
हँस रही बालियाँ मचल-मचल,
सबके मन को भाया बसन्त।
मधुबन में मुस्काया बसन्त।।
बासन्ती सुमनों की आभा,
दे रही प्रणय का अभिमन्त्रण,
 मधुमक्खी ने स्वीकार किया,
पुष्पों का स्नेहिल-आमन्त्रण,
खुशियों को लाया है बसन्त।
मधुबन में मुस्काया बसन्त।।
मनभावन पुष्पों पर तितली,
मतवाली होकर बैठी है,
पाकर पराग मीठा-मीठा
अपनी धुन में ही ऐंठी है,
नयनों में है छाया बसन्त।
मधुबन में मुस्काया बसन्त।।
झाड़ी के पीछे से आकर,
झाँकता भास्कर अमल-धवल,
अनुपम छवियों से भरमाते,
तालाबों में खिल रहे कमल,
तन-मन में गदराया बसन्त।
मधुबन में मुस्काया बसन्त।।

LinkWithin